मतदाता सूची से नाम हटाने का बताएं उचित आधार

भारतीय जनता पार्टी ने राज्य निर्वाचन आयोग से सवाल किया कि जिन मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से हटाया गया है, उसका आधार क्या है। पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल गुरूवार को राज्य निर्वाचन आयुक्त से मिला और नगरीय निकाय एवं त्रि-स्तरीय पंचायतीराज के निर्वाचन के संबंध में अपनी मांगों को लेकर एक ज्ञापन सौंपा।

मतदाता सूची से नाम हटाने का बताएं उचित आधार

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी ने राज्य निर्वाचन आयोग से सवाल किया कि जिन मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से हटाया गया है, उसका आधार क्या है। पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल गुरूवार को राज्य निर्वाचन आयुक्त से मिला और नगरीय निकाय एवं त्रि-स्तरीय पंचायतीराज के निर्वाचन के संबंध में अपनी मांगों को लेकर एक ज्ञापन सौंपा।

भाजपा ने कहा कि चुनाव में अधिकतम मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें और बगैर किसी वैध कारण के मतदान से वंचित न रह जाएं, इसलिए मतदाताओं को प्रारंभिक मतदाता सूचियों के निरीक्षण का अवसर दिया जाए। ज्ञापन में कहा गया है कि पुरानी प्रकाशित सूची में कई मतदाताओं के नाम काट दिये गए हैं। ऐसे मामलों में नाम काटने का आधार भी सूची में प्रकाशित किया जाए।

ज्ञापन में मांग की गई है कि सभी विस्थापित बस्तियों के मतदाताओं को राज्य चुनाव आयोग द्वारा उनके मतदान केन्द्रों की जानकारी देने की व्यवस्था विशेष रूप से की जाए। पार्टी की ओर से मांग की गई है कि स्थानीय निकायों के मतदान केन्द्रों की सूची अविलंब प्रकाशित की जाए। मतदान केन्द्रों की घोषणा के साथ ही बीएलओ के नाम भी घोषित किये जाएं। दोनों प्रक्रियाओं के बाद ही मतदाता सूचियों का प्रारंभिक प्रकाशन कर उन्हें बूथ केन्द्र पर प्रदर्शित किया जाए, उसके बाद ही दावे-आपत्तियां बुलाकर अंतिम प्रकाशन किया जाए।

हटाए गए नाम समायोजित किए जाएं

पार्टी द्वारा दिये गए ज्ञापन में कहा गया है कि 152 भोपाल दक्षिण पश्चिम विधानसभा की प्रकाशित मतदाता सूची में सभी बूथों में 46189 मतदाताओं के नाम जानबूझकर षडयंत्रपूर्वक विलुप्त किए गए हैं, जो कि मतदाताओं के मूल अधिकारों का हनन है एवं बहुत ही गंभीर अनियमितता है। नाम काटने का उचित कारण भी नहीं बताया जा रहा है। प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयुक्त से 152 भोपाल दक्षिण पश्चिम विधानसभा के सभी बूथों से काटे गए नामों में से उपयुक्त मतदाताओं के नामों को सूची में समायोजित करवाने की मांग की।

मध्य प्रदेश में महापौर का चुनाव सीधे मतदाताओं से कराए जाने की व्यवस्था लागू करने से पार्षदों का महापौर को वापस बुलाने का अधिकार (राइट टू रिकाल) भी बहाल होगा। यदि तीन चौथाई पार्षद महापौर के प्रति अविश्वास प्रकट करते हुए हस्ताक्षरयुक्त आवेदन देते हैं तो सरकार की सिफारिश पर राज्य निर्वाचन आयोग खाली कुर्सी-भरी कुर्सी का चुनाव कराएगा।

इसमें जनता मतदान कर तय करेगी कि महापौर पद पर बना रहेगा या नहीं। कमल नाथ सरकार ने अप्रत्यक्ष प्रणाली लागू करके पार्षदों से यह अधिकार छीन लिया था। हालांकि इस आधार पर चुनाव नहीं हो सका।

नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अधिकारियों ने बताया कि कांग्रेस सरकार के समय अधिनियम में जो संशोधन किया था, उसमें अप्रत्यक्ष प्रणाली थी। पार्षद के बीच से ही महापौर चुना जाना था इसलिए वापस बुलाने के लिए मतदान कराए जाने की व्यवस्था नहीं थी। यदि पार्षदों का महापौर के प्रति विश्वास नहीं रहता तो वे अपने बीच से ही दूसरा महापौर चुन सकते थे लेकिन अब प्रत्यक्ष प्रणाली में यह अधिकार जनता के ही पास रहेगा। पार्षद यदि अविश्वास प्रस्ताव लाते हैं और वह विधिसम्मत पाया जाता है तो सरकार राज्य निर्वाचन आयोग से महापौर को वापस बुलाने के संबंध में चुनाव कराने की सिफारिश करेगी। इसके लिए अधिनियम में प्रविधान भी किया जाएगा। महापौर को वापस बुलाने के लिए कम से कम दो साल का कार्यकाल पूरा होना जरूरी होगा और उसका कार्यकाल छह माह शेष रहने से पहले ही अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। इसके लिए कलेक्टर को प्रस्ताव देना होगा। कलेक्टर इसका परीक्षण करने के बाद शासन को सिफारिश करेगा। यदि संबंधित निकाय के मतदाता खाली कुर्सी के पक्ष में मतदान करते हैं तो महापौर को पद छोड़ना पड़ेगा और यदि भरी कुर्सी के पक्ष में मतदान होता है तो वह पद पर बना रहेगा।