भारत में चंद पैसों की लालच में लोग जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया में बनने वाली हर तीन में से दो एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल इंसानों के इलाज के लिए नहीं, बल्कि दूध, मांस, अंडा और मछली का उत्पादन बढ़ाने में हो रहा है।
By: Arvind Mishra
Feb 08, 20269:30 AM
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
भारत में चंद पैसों की लालच में लोग जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया में बनने वाली हर तीन में से दो एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल इंसानों के इलाज के लिए नहीं, बल्कि दूध, मांस, अंडा और मछली का उत्पादन बढ़ाने में हो रहा है। दरअसल, देश में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस अब केवल अस्पतालों और दवाओं की समस्या नहीं रह गई है। कृषि और पशुपालन, मुर्गीपालन व मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक और अनुचित उपयोग के कारण रेसिस्टेंट बैक्टीरिया कृषि उत्पादों और मांसाहार के जरिये भोजन की थाली तक पहुंच चुका है। इसी को देखते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने भी दूध, मांस, अंडा, पोल्ट्री और मत्स्य उत्पादन में एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग पर सख्त रोक लगा दी है।
एक अदृश्य महामारी
यही अधाधुंध उपयोग एएमआर को एक अदृश्य महामारी बना रहा है और सामान्य संक्रमणों में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाएं धीरे-धीरे बेअसर होती जा रही हैं और इलाज जटिल व महंगा होता जा रहा है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि केंद्र सरकार को पशुपालन और मत्स्य उत्पादन में इस्तेमाल हो रही 37 एंटीमाइक्रोबियल दवाओं पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। इनमें 18 एंटीबायोटिक, 18 एंटीवायरल और एक एंटी-प्रोटोजोअन दवा शामिल हैं।
साफ दिख रही जागरुकता की कमी
ये रेसिस्टेंट बैक्टीरिया केवल भोजन के जरिये ही नहीं, बल्कि पशुओं के सीधे संपर्क, उनके मल-मूत्र से दूषित मिट्टी और जल स्रोतों के माध्यम से भी फैल रहे हैं। यही वजह है कि एएमआर अब स्वास्थ्य संकट के साथ-साथ जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण से जुड़ा गंभीर खतरा बन चुका है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और इंडियन नेटवर्क फार फिशरीज एंड एनिमल एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि कमजोर जैव सुरक्षा, पशुओं की अनियमित चिकित्सकीय निगरानी और किसानों में जागरूकता की कमी इस संकट को और गहरा रही है।