दमोह शहर के तहसील मैदान में आयोजित स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में जिले के प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार से दमोह के मीसाबंदी संतोष भारती ने सम्मान लेने से मना कर दिया और वह वापस चले गए। मंत्री के साथ मौजूद कलेक्टर ने भी भारती को काफी मनाने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं माने।

मंत्री इंदर सिंह परमार से बात करते दमोह के मीसाबंदी संतोष भारती।
दमोह शहर के तहसील मैदान में आयोजित स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में जिले के प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार से दमोह के मीसाबंदी संतोष भारती ने सम्मान लेने से मना कर दिया और वह वापस चले गए। मंत्री के साथ मौजूद दमोह कलेक्टर सुधीर कोचर ने भी भारती को काफी मनाने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं माने। भारती ने मंत्री परमार को एक आवेदन दिया और अपना गुस्सा भी जाहिर किया और बगैर सम्मान कराए वहां से चले गए। इस मामले में जब मंत्री परमार से संतोष भारती द्वारा सम्मान न कराने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता उन्होंने ऐसा क्यों किया और उसके बाद चुप्पी साध ली। दूसरी ओर भारती से सम्मान न करवाने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा वह सम्मान के नहीं न्याय के भूखे हैं। मीसाबंदी संतोष भारती ने कहा कि मैं वहां सम्मान लेने के लिए नहीं गया था। मैंने कभी किसी मंच पर जाकर सम्मान नहीं लिया। आज मेरे जाने का मकसद ज्ञापन देने जाना था, न्याय पाने गया था। मैं देश का पहला इकलौता ऐसा व्यक्ति हूं जो तीन बार मीसाबंदी रहकर जेल गया।
संतोष भारती ने कहा कि 40 साल पहले मैंने हाउसिंग बोर्ड से जमीन खरीदी थी। मैंने पांच हजार की रिश्वत अधिकारी को नहीं दी तो आज तक उसकी रजिस्ट्री हाउसिंग बोर्ड नहीं कर रहा। मैं मध्य प्रदेश शासन से और हाई कोर्ट से केस जीता उसके बाद भी मेरी रजिस्ट्री नहीं हो रही। पहले कांग्रेस का शासन था तो लोग शासन बदलने की बात करते थे। अब 25 साल से भाजपा की सरकार है, लेकिन मुझे आज भी न्याय नहीं मिल रहा है।
संतोष भारती ने कहा कि मैं सम्मान का भूखा नहीं हूं। राजनीति कोई धंधा नहीं है। हमारे पास रोजगार, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य की व्यवस्थाएं होनी चाहिए नहीं तो यह सम्मान का मतलब पाखंड है। हम मूल्यों की राजनीति करते हैं। मंत्री की चुप्पी पर भारती ने कहा कि मैंने उनसे बात की थी और मैंने उन्हें ज्ञापन दिया। यदि वह कह रहे हैं कि मुझे कोई ज्ञापन नहीं दिया तो वह सफेद झूठ बोल रहे हैं।
आज 15 अगस्त को मीसाबंदियों को यह जो मान सम्मान देने का प्रसंग चल रहा है उससे मैं अपने आपको पृथक कर रहा हूं। कारण मैं इस भारत देश का इकलौता व्यक्त्ति जो एक नहीं बल्कि तीन बार का मीसाबंदी हूं। सबसे पहले 1973 में पुलिस विद्रोह भड़काकर राज्य सत्ता को पलटने के आरोप में पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद यादव के साथ। दूसरी बार 1974 में आल इंडिया रेलवे मैन्स फेडरेशन की ओर से रेल हड़ताल के आव्हान करने पर और तीसरी बार 1975 में आपातकाल के दौरान साथी जार्ज फर्नांडिस सहित करीब 6 माह संपूर्ण देश में जनजागरण अभियान में सक्रिय रहने के बाद गिरफ्तारी कर गुनाहखाने में एकांत में रखा गया। मान्यवर मुझे यह मान सम्मान नहीं बल्कि सच्चे न्याय की दरकार है। यह सम्मान किस काम का जबकि पिछले करीब 40 सालों से लगातार जिस न्याय के लिए मैं दर-दर की ठोकरें खा रहा हूं।

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