भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है, जहाँ एक ओर शैक्षणिक अवसरों के नए क्षितिज खुल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इन अवसरों की आड़ में अराजकता, अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का अँधेरा भी तेजी से फैल रहा है।

कमलाकर सिंह
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है, जहाँ एक ओर शैक्षणिक अवसरों के नए क्षितिज खुल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इन अवसरों की आड़ में अराजकता, अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का अँधेरा भी तेजी से फैल रहा है। निजी विश्वविद्यालयों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि ने उच्च शिक्षा की पहुँच को तो अवश्य ही विस्तारित किया है, लेकिन इसी विस्तार के भीतर पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता के नाम पर एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जो दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है। हाल ही में मध्यप्रदेश के सीहोर जिले स्थित वीआईटी विश्वविद्यालय में जो घटनाएँ सामने आईं, उन्होंने न केवल राज्य बल्कि संपूर्ण देश की उच्च शिक्षा प्रणाली की जड़ को हिलाकर रख दिया है। हजारों विद्यार्थियों द्वारा उग्र प्रदर्शन, विश्वविद्यालय की बसों और संपत्तियों को नुकसान, कैंपस में पुलिस और एसटीएफ का जबरन प्रवेश, विद्यार्थी और प्रशासन दोनों पर एफआईआर—क्या यह तस्वीर किसी संस्था की है जो भविष्य गढ़ती है या उस व्यवस्था की जो भविष्य को ही संकट में डाल रही है?
वास्तविक स्थिति की परतें खुलने पर जो तथ्य सामने आए वे और भी अधिक चिंताजनक हैं। छात्रों को परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता इतनी खराब पाई गई कि कई विद्यार्थी बीमार हो गए। पीने के पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता न्यूनतम स्तर पर रही। और जब इन आधारभूत समस्याओं को लेकर विद्यार्थियों ने आवाज उठाई, तो संवाद के बजाय उन्हें धमकाया गया, हॉस्टल के मुख्य गेट बंद कर दिए गए, उनकी आवाज दबाने का प्रयास किया गया। यह स्थिति किसी एक प्रशासनिक चूक का परिणाम नहीं, बल्कि एक पुरानी लापरवाही का विस्फोट था। जिस शिक्षा व्यवस्था में गुरु-शिष्य संबंध को सबसे पवित्र माना जाता है, उसी में अब अविश्वास, संदेह और संघर्ष का वातावरण बन गया है। ज्ञान के केंद्र में यदि भय स्थापित हो जाए तो वहाँ शिक्षा नहीं, केवल भवन रह जाते हैं।
इस पूरे मामले ने शासन-प्रशासन की सुस्ती को भी उजागर कर दिया। घटनाओं के भड़कने के बाद सरकार हरकत में आई और उच्च शिक्षा मंत्री ने कहा कि इस बार ऐसी कार्रवाई की जाएगी जो कभी नहीं हुई। सरकार ने यह भी पूछा कि विश्वविद्यालय को किले की तरह क्यों संचालित किया जा रहा है और प्रशासन को हटाने पर विचार क्यों न किया जाए। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी देर क्यों? छात्रों के पेट में खराब भोजन उतरता रहा, मन में भय बैठता रहा, कैंपस में तनाव बढ़ता रहा—पर नियमन और निरीक्षण कहाँ थे? विद्यार्थियों की शिकायतें तब ध्यान में आईं जब वे सड़क पर उतरने को मजबूर हुए। यह स्थिति बताती है कि संवाद की प्रणाली विफल हो चुकी है।
घटना की गंभीरता इस बात से और स्पष्ट होती है कि यह मामला केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्यसभा में भी गूँज उठा है। राज्यसभा में सांसदों ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि यह घटना केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं, बल्कि एक चेतावनी है और सरकार को तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। वहाँ यह भी स्पष्ट कहा गया कि विश्वविद्यालयों मेंखाद्य सुरक्षा मानकों पर ेी१ङ्म ळङ्म’ी१ंल्लूी नीतिलागू होनी चाहिए, क्योंकि यह विद्यार्थियों के जीवन और स्वास्थ्य का प्रश्न है। राज्यसभा में यह टिप्पणी भी सामने आई कि कार्रवाई तभी होती है जब छात्र अस्पताल पहुँच जाते हैं, जबकि रोकथाम और सतर्कता इससे पहले होनी चाहिए। यह स्वीकारोक्ति है कि वर्तमान व्यवस्था प्रतिक्रिया-आधारित है, प्रतिबंधात्मक नहीं।
विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान सत्ता और विपक्ष दोनों ने सरकार की घेराबंदी करते हुए न्यायिक जांच की मांग की। यह तथ्य भी सामने रखा गया कि पूरे विश्वविद्यालय में कुल 13 हजार विद्यार्थियों में से लगभग 3 हजार ने आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। यह किसी क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं, बल्कि कैंपस में जड़ जमा चुकी गहरी अस्वस्थता का संकेत है। विद्यार्थियों पर दर्ज एफआईआर को वापस लेने की माँग भी जोरदार ढंग से उठी, ताकि उनका भविष्य अकारण न बिगड़ जाए। साथ ही एक चौंकाने वाली जानकारी यह भी सामने आई कि विश्वविद्यालय में हनुमान चालीसा पढ़ने पर पाँच हजार रुपये का जुमार्ना लगाया गया था, जो न केवल प्रबंधन की मनमानी का प्रमाण है, बल्कि संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता पर अनुचित नियंत्रण का उदाहरण भी है। शिक्षा का स्थान विचारों को मुक्त करने का होता है, बाँधने का नहीं।
यदि उच्च शिक्षा व्यवस्था में ऐसी विसंगतियाँ पैदा हो रही हैं तो उसके लिए जिम्मेदार केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि पूरा नियामक ढाँचा है। वर्ष 2007 में लागू मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय अधिनियम का उद्देश्य उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना और पिछड़े जिलों तक संस्थानों का विस्तार करना था। किन्तु आज वास्तविकता यह है कि प्रदेश में लगभग 53 निजी विश्वविद्यालयों में से अधिकांश भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे विकसित शहरी क्षेत्रों में ही केंद्रित हैं। जिन आदिवासी और सीमावर्ती जिलों को शिक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है, वहाँ उच्च शिक्षा का अभाव अब भी वैसा ही है। इससे साफ है कि कई विश्वविद्यालय शिक्षा के विस्तार नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ और बाजार को ध्यान में रखकर स्थापित हुए हैं।
नियामक आयोग, निरीक्षण समितियाँ, राज्यपाल का कुलाध्यक्ष के रूप में अधिकार—ये सब कागजों में तो मौजूद हैं, पर जमीन पर उनका असर नहीं दिखता? सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कह चुका है कि शिक्षा को किसी भी रूप में केवल व्यापारिक गतिविधि नहीं माना जा सकता। फिर भी व्यवहार में विश्वविद्यालय प्रबंधन विद्यार्थियों को ग्राहक और शिक्षा को उत्पाद बनाकर प्रस्तुत कर रहा है। विद्यार्थी यदि न्याय और सुरक्षा के लिए धरने पर बैठने और हिंसक टकराव की स्थिति पैदा करने को मजबूर हो जाएँ, तो यह संकेत है कि व्यवस्था में संवाद का पुल पूरी तरह ढह चुका है।
यह परिस्थिति केवल वीआईटी की नहीं, उच्च शिक्षा के समग्र ढांचे की चेतावनी है। आज आवश्यकता आश्वासन की नहीं, त्वरित और कठोर कार्रवाई की है। नियमों को सिर्फ पुस्तकों में नहीं, व्यवहार में उतारने की जरूरत है। शिकायत निवारण तंत्र पूरी तरह स्वतंत्र और प्रभावी होना चाहिए। छात्रों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक कल्याण पर शून्य-समझौते की नीति अपनाई जानी चाहिए। वित्तीय पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता बननी चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास का वह संबंध पुनर्स्थापित किया जाए, जो शिक्षा की आत्मा है। जहाँ भय हो, वहाँ ज्ञान का प्रकाश कभी नहीं फैल सकता।
वीआईटी की घटना केवल एक विश्वविद्यालय की समस्या नहीं है, यह भविष्य का संकेत है—यदि इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे, तो उच्च शिक्षा का पूरा तंत्र भरोसा खो देगा। आश्वासन तब तक सार्थक नहीं जब तक कार्रवाई उससे आगे न निकल जाए। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री बाँटना नहीं, बल्कि चरित्रवान, संवेदनशील और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करना है। यदि विश्वविद्यालय यही भूल गए, तो चाहे वे कितनी भी ऊँची इमारतें खड़ी कर लें, शिक्षा के मंदिर नहीं बन सकेंगे, वे केवल खाली किले बनकर रह जाएँगे।
यह समय निर्णय का है—उच्च शिक्षा की प्रतिष्ठा बचाने का, विद्यार्थियों के भविष्य को सुरक्षित करने का और राष्ट्रनिर्माण के मूल उद्देश्य को पुनर्स्थापित करने का। यदि इस संकट को गंभीरता से नहीं लिया गया तो हम केवल दर्शक बनकर देखेंगे कि कैसे एक-एक करके हमारी शिक्षा व्यवस्था अपनी विश्वसनीयता खोती चली जा रही है। कार्रवाई अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है, और यही अनिवार्यता उच्च शिक्षा के कल को बचा सकती है।
- लेखक पूर्व कुलपति हैं

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