मध्यप्रदेश की सोलहवीं विधानसभा का एक दिवसीय सत्र 17 दिसंबर को जिस विषय पर केंद्रित है। वह राज्य के दीर्घकालिक भविष्य से जुड़ा हुआ है। मध्यप्रदेश को विकसित, आत्मनिर्भर और समृद्ध राज्य बनाना ऐसा लक्ष्य है, जिस पर व्यापक सहमति संभव है। यह विषय केवल किसी एक सरकार या कार्यकाल से नहीं, बल्कि राज्य की निरंतर विकास-यात्रा से जुड़ा है।

मध्यप्रदेश की सोलहवीं विधानसभा का एक दिवसीय सत्र 17 दिसंबर को जिस विषय पर केंद्रित है।
कमलाकर सिंह
मध्यप्रदेश की सोलहवीं विधानसभा का एक दिवसीय सत्र 17 दिसंबर को जिस विषय पर केंद्रित है। वह राज्य के दीर्घकालिक भविष्य से जुड़ा हुआ है। मध्यप्रदेश को विकसित, आत्मनिर्भर और समृद्ध राज्य बनाना ऐसा लक्ष्य है, जिस पर व्यापक सहमति संभव है। यह विषय केवल किसी एक सरकार या कार्यकाल से नहीं, बल्कि राज्य की निरंतर विकास-यात्रा से जुड़ा है। ऐसे में यह अपेक्षित है कि इस पर चर्चा घोषणाओं से आगे बढ़कर संतुलित नीति, जमीनी यथार्थ और व्यावहारिक प्राथमिकताओं पर केंद्रित हो। मध्यप्रदेश को विकसित और आत्मनिर्भर बनाने का मूल उद्देश्य उसकी पूर्ण आर्थिक क्षमता को साकार करना है। वर्तमान में लगभग13-14 लाख करोड़ के आकार की राज्य अर्थव्यवस्था को दीर्घकाल में कई गुना विस्तार देने की परिकल्पना तभी सार्थक होगी, जब विकास को केवल समग्र आंकड़ों तक सीमित न रखकर रोजगार, उत्पादकता, मानव विकास और क्षेत्रीय संतुलन से जोड़ा जाए। आर्थिक वृद्धि तब ही टिकाऊ मानी जाएगी, जब उसका लाभ समाज के सभी वर्गों और राज्य के सभी क्षेत्रों तक पहुंचे।
एक विकसित राज्य बनने के लिए यह आवश्यक है कि मध्य प्रदेश परंपरागत कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के साथ-साथ प्रौद्योगिकी, रक्षा और विनिर्माण जैसे उच्च मूल्यवर्धन वाले क्षेत्रों पर भी निरंतर ध्यान दे। निवेश-अनुकूल नीतियां, ईज आॅफ डूइंग बिजनेस में वास्तविक सुधार और नीति-स्थिरता इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। सिंगल-विंडो जैसी व्यवस्थाओं की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे जमीनी स्तर पर कितनी सरल, पारदर्शी और समयबद्ध हैं। उभरते तकनीकी क्षेत्रों में राज्य की संभावनाएं व्यापक हैं, बशर्ते नीतिगत मंशा और अवसंरचना विकास में सामंजस्य बना रहे।
मध्यप्रदेश की केंद्रीय भौगोलिक स्थिति उसका एक स्वाभाविक रणनीतिक लाभ है। देश के मध्य में स्थित होने के कारण राज्य लॉजिस्टिक्स और सप्लाई-चेन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर सकता है। वेयर हाउसिंग, मल्टी-मॉडल परिवहन, सड़क और रेल कनेक्टिविटी का विकास यदि संतुलित ढंग से किया जाए, तो यह लाभ राज्य के सभी क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। इससे क्षेत्रीय विकास में समानता बढ़ेगी और औद्योगिक तथा व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार व्यापक होगा।
अवसंरचना विकास किसी भी आर्थिक प्रगति की आधारशिला है। राष्ट्रीय राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों का विस्तार केवल आवागमन को सुगम नहीं बनाता, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि बाजार और स्थानीय उद्यमों को भी सशक्त करता है। इसी प्रकार, विश्वसनीय और सुलभ विद्युत आपूर्ति-विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से-दूरस्थ और अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में सहायक हो सकती है। अवसंरचना का संतुलित विस्तार ही क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने का प्रभावी साधन बन सकता है।
कृषि क्षेत्र, जो लंबे समय तक मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था का आधार रहा है, अब नवाचार और गुणवत्ता सुधार की अपेक्षा करता है। उत्पादन के साथ-साथ पोषण मूल्य में सुधार, डिजिटल कृषि पहलों का विस्तार और कृषि को खाद्य प्रसंस्करण से जोड़ना किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हो सकता है। इससे उन क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, जहां औद्योगिक विकास अपेक्षाकृत धीमा रहा है, और ग्रामीण-शहरी संतुलन को मजबूती मिलेगी।
शहरीकरण की बढ़ती गति के बीच शहरी अवसंरचना पर ध्यान देना आवश्यक है, पर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि विकास कुछ बड़े शहरों तक सीमित न रह जाए। छोटे और मध्यम शहरों, जिला मुख्यालयों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बुनियादी सेवाओं का विस्तार संतुलित विकास की दृष्टि से आवश्यक है। इससे न केवल शहरी दबाव कम होगा, बल्कि क्षेत्रीय आर्थिक अवसर भी सृजित होंगे।
किसी भी दीर्घकालिक विकास रणनीति की सफलता मानव संसाधन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच राज्य के प्रत्येक क्षेत्र तक सुनिश्चित करना, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में, सामाजिक न्याय और आर्थिक उत्पादकता—दोनों के लिए आवश्यक है। शिक्षा और कौशल विकास को क्षेत्रीय आवश्यकताओं और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़कर एक ऐसा कार्यबल तैयार किया जा सकता है, जो राज्य की विकास-योजना का वास्तविक आधार बने।
शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और प्रशासनिक दक्षता विकास-प्रक्रिया की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करती है। सार्वजनिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग तभी संभव है, जब योजनाओं का क्रियान्वयन समयबद्ध, उत्तरदायी और परिणामोन्मुख हो। तकनीक-आधारित शासन और नियमित निगरानी व्यवस्था से नीतियों और योजनाओं के वास्तविक प्रभाव का आकलन संभव हो सकता है।
प्रौद्योगिकी और नवाचार भविष्य की अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभ हैं। स्टार्टअप संस्कृति को प्रोत्साहन, विज्ञान और तकनीक का योजनाओं में समावेश तथा नई तकनीकों का विवेकपूर्ण उपयोग राज्य को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर कर सकता है। यह युवाओं के लिए अवसर सृजित करने के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के बीच विकास-अंतर को कम करने में भी सहायक हो सकता है।
कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश को विकसित, आत्मनिर्भर और समृद्ध राज्य बनाने की परिकल्पना एक समग्र और दीर्घकालिक दृष्टि की मांग करती है। इसका वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा, जब आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ क्षेत्रीय संतुलन, मानव विकास और सुशासन पर समान रूप से ध्यान दिया जाए। विधानसभा में होने वाली चर्चा इस बात का अवसर है कि विकास के लक्ष्य के साथ-साथ उसके रास्तों को भी संतुलित, समावेशी और व्यवहारिक बनाया जाए, ताकि प्रगति राज्य के हर हिस्से तक पहुंच सके।
पूर्व कुलपति, भोपाल


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