मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अशासकीय कॉलेजों के प्रोफेसरों को 7वें वेतन आयोग का लाभ देने का अहम आदेश दिया है। जानें क्या है यह फैसला, किन प्रोफेसरों को मिलेगा लाभ और कैसे होगा एरियर्स का भुगतान।
By: Ajay Tiwari
Jul 16, 20257:18 PM
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जबलपुर: स्टार समाचार वेब
मध्यप्रदेश के अशासकीय कॉलेजों के प्राध्यापकों के लिए एक बड़ी खबर है। जबलपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया है कि 31 मार्च 2000 से पहले नियुक्त हुए इन कॉलेजों के प्रोफेसरों को भी सातवें वेतन आयोग के तहत वेतन और अन्य लाभ प्रदान किए जाएं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुदान प्राप्त अशासकीय कॉलेजों के शिक्षक भी सरकारी कॉलेजों के प्राध्यापकों के समान ही सातवें वेतनमान के हकदार हैं। इसे शिक्षकों के लंबे संघर्ष के बाद एक बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है।
एरियर्स और भुगतान का स्पष्ट निर्देश
न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि मध्यप्रदेश सरकार को 31 मार्च 2000 से पहले नियुक्त सभी प्राध्यापकों को 1 जनवरी 2016 से लागू सातवें वेतनमान का लाभ देना होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता प्राध्यापकों को आगामी 4 महीनों के भीतर कुल एरियर्स का 25 प्रतिशत भुगतान किया जाए। जो प्राध्यापक वर्तमान में सेवा में हैं, उन्हें शेष राशि 12 महीनों के भीतर मिलेगी, जबकि सेवानिवृत्त हो चुके प्राध्यापकों को यह भुगतान 9 महीनों के भीतर सुनिश्चित किया जाए।
देरी पर ब्याज का प्रावधान
अदालत ने यह भी आदेश दिया है कि यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो राज्य सरकार को 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज के साथ एरियर्स का भुगतान करना होगा।
सरकार की पुरानी अनदेखी
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता एल.सी. पटने और अभय पांडे ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने 27 फरवरी 2024 को अनुदान प्राप्त कॉलेजों के शिक्षकों को सातवें वेतनमान का लाभ देने से इनकार कर दिया था, जबकि सरकारी कॉलेजों के शिक्षकों को 18 जनवरी 2019 को ही यह लाभ मिल चुका था। यह भी बताया गया कि इस मामले में पूर्व में भी हाई कोर्ट ने शिक्षकों के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन सरकार ने उस आदेश की भी अनदेखी की थी, जिसके बाद अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी थी। डॉ. ज्ञानेंद्र त्रिपाठी, जो मप्र अशासकीय महाविद्यालयीन प्राध्यापक संघ के प्रांत अध्यक्ष भी हैं, इस मामले के प्रमुख याचिकाकर्ताओं में से एक हैं। यह फैसला हजारों शिक्षकों के लिए एक बड़ी उम्मीद लेकर आया है।

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