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भोपाल गैस त्रासदी: 1984 की वो काली रात, जब मौत के लश्कर आए थे और सोता शहर हो गया था लाशों में तब्दील

भोपाल की वह काल की रात... जब बिस्तर-बिस्तर मौत के लश्कर आए थे...  सोए शहर के लोग लाशों में तब्दील होने लगे थे। जो उस रात के गवाह है वह आज भी सिहर उठते उन पलों को याद करते हुए.. जब सड़कों पर हांफते, खांसते, गिरते-उठते लोग जान बचाने भाग रहे थे।

By: Ajay Tiwari

Nov 29, 20256:23 PM

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भोपाल गैस त्रासदी: 1984 की वो काली रात, जब मौत के लश्कर आए थे और सोता शहर हो गया था लाशों में तब्दील

अजय तिवारी

भोपाल की वह काल की रात... जब बिस्तर-बिस्तर मौत के लश्कर आए थे...  सोए शहर के लोग लाशों में तब्दील होने लगे थे। जो उस रात के गवाह है वह आज भी सिहर उठते उन पलों को याद करते हुए.. जब सड़कों पर हांफते, खांसते, गिरते-उठते लोग जान बचाने भाग रहे थे। वह रात थी साल 1984, की दो-तीन दिसंबर की..  कड़ाके की सर्दी। आधी रात को जब लोग गहरी नींद में थे, तब किसको नहीं पता था, इस शहर (भोपाल) की शहर सुबह.. लाशों के शहर की पहचान बनेगी। बात कर रहे हैं भोपाल गैस त्रासदी की। भोपाल का इतिहास इस काले दिन से ही अब शुरू होने लगा है.. उस रात की याद से आज भी लोगों की रूह कांप जाती है।

कहां और कैसे हुआ था हादसा

अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड भोपाल कारखाने में कीटनाशक बनाने का काम करती थी, जिसे मिथाइल आइसोसाइनेट नाम की गैस की मदद से बनाया जाता था। इस गैस का पानी के साथ रिएक्शन इसे और खतरनाक बनाता था। उस दिन कर्मचारी केमिकल प्रोसेसिंग यूनिट की सफाई कर रहे थे। इसकी सफाई में इस्तेमाल पानी बहते हुए गैस के स्टोरेज टैंक तक पहुंच गया। धीरे-धीरे गैस ने पानी के साथ रिएक्ट किया और हादसा हो गया। 

गवाह मैं भी उस रात का

उस रात का मैं भी गवाह हूं रेलवे कॉलोनी (पश्चिम) रहता था। अचानक सायरन बचा था और भागो-भागो की चीखें सुनाई देने लगी थी, जो हर पल के साथ गहरी होती जा रही थी। दो दिसंबर को करीब 12 बजे के बाद का समय रहा होगा। घरों में सो रहे लोगों की आंखें जलने लगीं और सांस लेने में तकलीफ होने लगी। सायरन की आवाज और लोगों में मची अफरातफरी से पूरे शहर में हाहाकार मचा हुआ था। कोई घर में तड़प रहा था तो कोई सड़कों पर भाग रहा था। 

सड़कों पर सिर्फ लाशें ही लाशें

3 दिसंबर की सुबह उजाले से भरी थी, लेकिन मातम था, डरे हुए लोग थे और घरों से लाशें निकल रही थी। अस्पतालों में इतनी भीड़ थी कि उनके गेट बंद करने पड़ गए। चिकित्सक भी किस तरह इलाज करें क्या इलाज करें सोच रही थे। अस्पतालों के बाहर भी लाशें बिछीं थी। शहर में इंसान ही नहीं जानवर भी मरे पड़े थे।  कहा जाता है लगभग 30000 इंसान और 2 से 3 हजार जानवरों ने इस त्रासदी में अब तक जान गंवा दी है। हालांकि सरकारी आंकड़े अलग हैं। सरकार के आधिकारिक आंकड़ों में इस हादसे में 3 हजार लोगों की मौत हुई थी।

जानिए कितनी खतरनाक थी गैस

1984 की उस काली रात को यूनियन कार्बाइड नाम की कंपनी से लगभग 60 टन मिथाइल आइसोसाइनेट गैस लीक हुई। ये इतनी खतरनाक गैस थी कि जो भी इसके संपर्क में आया, वो या तो दुनिया छोड़ गया या वो जिंदगी भर के लिए दिव्यांग हो गया। जो सो रहे थे वो सोते ही रह गए। यही नहीं, इस गैस के प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उस समय की गर्भवती महिलाओं के बच्चे तक अपंग पैदा हुए। आज भी इसका प्रभाव भोपाल के कुछ इलाकों में देखने को मिल जाता है।

2014 में हुई वॉरेन एंडरसन की हुई मौत

यूनियन कार्बाइड कारखाने के मालिक वॉरेन एंडरसन इतने बड़े हादसे के बाद भोपाल आया, लेकिन कुछ घंटों में अमेरिका चला गया। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने एंडरसन को गिरफ्तार भी कराया लेकिन अमेरिकी सरकार के दवाब में आकर भारत सरकार ने उसे जमानत पर जाने दिया, शर्त ये थी कि जब भी कानून उसे बुलाएगा तो उसे आना पड़ेगा। एक बार जाने के बाद वह लौटा नहीं। उसके खिलाफ दो बार वारंट जारी हुए, इसके बावजूद वो नहीं लौटा। इतनी बड़ी त्रासदी के लिए बिना सजा पाए 2014 में एंडरसन की मौत हो गई।

लेखक खुद गैस त्रासदी के गवाह हैं

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