हर साल 30 जनवरी को विश्व कुष्ठ रोग दिवस मनाया जाता है। भारत में इस दिन को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के साथ जोड़कर विशेष रूप से याद किया जाता है, क्योंकि गांधीजी ने कुष्ठ रोगियों के साथ रहकर उनके दर्द को समझा और समाज में उनके प्रति सम्मान की मिसाल दी।

गांव-गांव में जागरूकता रैलियां, स्कूलों में सेमिनार, स्वास्थ्य शिविर और कुष्ठ रोगियों के साथ संवाद सत्र किए जा रहे हैं।
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
हर साल 30 जनवरी को विश्व कुष्ठ रोग दिवस मनाया जाता है। भारत में इस दिन को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के साथ जोड़कर विशेष रूप से याद किया जाता है, क्योंकि गांधीजी ने कुष्ठ रोगियों के साथ रहकर उनके दर्द को समझा और समाज में उनके प्रति सम्मान की मिसाल दी। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य कुष्ठ रोग से जुड़े कलंक और भेदभाव को खत्म करना, लोगों में जागरूकता फैलाना और इस बीमारी से प्रभावित लोगों को सम्मानजनक जीवन देने का आह्वान करना है। दावा किया जा रहा है कि भारत में दुनियाभर के 53 प्रतिशत कुष्ठ रोग के पीड़ित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत 2030 तक स्थानीय कुष्ठ रोग के केसों को खत्म करना चाहता है। लेकिन केंद्र सरकार ने 2027 तक कुष्ठ-मुक्त भारत का टारगेट तय किया है।
इसका इलाज पूरी तरह संभव
कुष्ठ रोग, बैक्टीरिया माइकोबैक्टीरियम लेप्री से होने वाली संक्रामक बीमारी है। अच्छी बात यह है कि इसका इलाज पूरी तरह संभव है। मल्टी ड्रग थेरेपी नाम की मुफ्त दवाओं से कुछ महीनों में ही मरीज पूरी तरह ठीक हो जाता है। अगर बीमारी का शुरुआती दौर में पता चल जाए, तो हाथ-पैर में कोई स्थायी नुकसान भी नहीं होता। मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
समाज में माना जाता है कलंक
दुखद है कि आज के दौर में भी सबसे बड़ी समस्या इलाज नहीं, बल्कि समाज का कलंक और मरीजों के साथ होने वाला कलंक है, जिसके कारण कुष्ठ रोगी को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। लोग सोचते हैं कि यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है, इसका कोई इलाज नहीं है या यह किसी पाप-श्राप का नतीजा है। इन गलत धारणाओं के चलते मरीजों के साथ भेदभाव होता है।
बच्चे स्कूल नहीं जा पाते
कुष्ठ रोगी को कई बार परिवार उन्हें घर से निकाल देता है, पड़ोसी दूरी बना लेते हैं, नौकरी छिन जाती है, बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और समाज में अलग-थलग पड़ जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कुष्ठ रोगी को लोग समझते नहीं हैं। कलंक इतना गहरा होता है कि बहुत से लोग लक्षण दिखने पर भी डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं। वे सोचते हैं कि अगर किसी को पता चल गया तो उनका जीवन बर्बाद हो जाएगा।
डर के कारण बढ़ रही बीमारी
लोगों में डर के कारण बीमारी बढ़ती रहती है। जटिलताएं आती हैं और संक्रमण दूसरों तक पहुंचता रहता है। यही वजह है कि विशेषज्ञों का कहना है कि कुष्ठ रोग का इलाज आसान है, असली चुनौती कलंक को मिटाना है। आज देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
समाज को भी आना होगा आगे
गांव-गांव में जागरूकता रैलियां, स्कूलों में सेमिनार, स्वास्थ्य शिविर और कुष्ठ रोगियों के साथ संवाद सत्र किए जा रहे हैं। इन प्रयासों से मिथकों को तोड़ने और शीघ्र जांच-उपचार के महत्व को समझाने की कोशिश की जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और केंद्र सरकार के संयुक्त अभियान से कुष्ठ रोग के नए मामले लगातार घट रहे हैं, लेकिन उन्मूलन के लिए समाज का सहयोग भी जरूरी है।


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