यूरोप की संघर्षरत ऑटो इंडस्ट्री 2035 से पेट्रोल-डीजल वाहनों पर लगने वाले प्रतिबंध को नरम करने के लिए यूरोपीय संघ (EU) पर दबाव डाल रही है। चीन की प्रतिस्पर्धा और 'क्लाइमेट न्यूट्रल' लक्ष्य पर जर्मनी, इटली और फ्रांस में मतभेद।

यूरोप की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और उसके समर्थक यूरोपीय संघ (ईयू) पर 2035 से नए पेट्रोल और डीजल वाहनों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के निर्णय को नरम करने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं। यह मुद्दा अब एक निर्णायक मोड़ पर आ चुका है और उम्मीद की जा रही है कि यूरोपीय आयोग द्वारा 10 दिसंबर को इस लक्ष्य की समीक्षा के दौरान कोई बड़ा नीतिगत फैसला लिया जा सकता है। यह प्रतिबंध दरअसल ईयू की महत्वाकांक्षी 2050 तक "क्लाइमेट न्यूट्रल" बनने की योजना का एक केंद्रीय स्तंभ है, जिसे 2023 में इसलिए अपनाया गया था क्योंकि नीति निर्माताओं का मानना था कि ऑटोमोबाइल क्षेत्र का डिकार्बोनाइजेशन (decarbonization) अन्य भारी उद्योगों की तुलना में अधिक आसानी से किया जा सकेगा। हालांकि, उद्योग संगठन ACEA के अनुसार, जमीन पर वास्तविक स्थिति कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण साबित हुई है।
चीन लाया सस्ते ईवी की बाढ़
यूरोपीय निर्माताओं के लिए यह संकट तब और गहरा गया है जब चीन यूरोपीय बाजार में सस्ते इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की बाढ़ ला चुका है, जिससे यूरोपीय कंपनियों को बाजार हिस्सेदारी खोने, बड़े पैमाने पर नौकरियों में कटौती करने और कई फैक्ट्रियां बंद होने की आशंका सताने लगी है। फ्रांस के ऑटो उद्योग समूह के प्रमुख ने मौजूदा स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए चेतावनी दी है कि, "जमीन पैर के नीचे से खिसक रही है," जो यूरोपीय ऑटोमोबाइल उद्योग की तेजी से बिगड़ती प्रतिस्पर्धी स्थिति को दर्शाता है। इस आर्थिक दबाव और चीनी प्रतिस्पर्धा के मद्देनजर, यूरोप के प्रमुख औद्योगिक देश अब इस प्रतिबंध में छूट की मांग कर रहे हैं ताकि उन्हें बदलाव के लिए अधिक समय मिल सके और वे बाजार में टिके रह सकें।
जर्मनी-इटली कर रहे छूट की मांग
प्रतिबंध में छूट की मांग का नेतृत्व विशेष रूप से जर्मनी और इटली कर रहे हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ईयू से यह आग्रह कर रहे हैं कि 2035 के बाद भी प्लग-इन हाइब्रिड (PHEV), रेंज-एक्सटेंडर वाहन और उच्च-दक्षता वाले (High-Efficiency) इंजन वाले वाहनों की बिक्री को अनुमति दी जानी चाहिए। उनका तर्क है कि यह दृष्टिकोण बाजार की मांग और तकनीकी विकास के साथ तालमेल बिठाने में मदद करेगा। वहीं, इटली की सरकार ने जोर दिया है कि बायोफ्यूल पर चलने वाली कारों को भी 2035 के बाद वैध रखा जाए। दूसरी ओर, फ्रांस इस 'ऑल-इलेक्ट्रिक' लक्ष्य को जस का तस बनाए रखने के पक्ष में मजबूती से खड़ा है, क्योंकि फ्रांस ने बैटरी निर्माण और इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास में भारी निवेश किया है, जिसे वह सुरक्षित रखना चाहता है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि, "अगर हम 2035 के लक्ष्य को छोड़ते हैं, तो यूरोप में स्थापित किए जा रहे बैटरी प्लांट्स पर भी पानी फिर जाएगा।"
बहस के बीच फ्रांस का इयू को सुझाव
इस बहस के बीच, फ्रांस ने ईयू के सामने एक रचनात्मक सुझाव भी रखा है, जिसमें यूरोपीय बैटरी निर्माण को बढ़ावा देने और कॉरपोरेट फ्लीट (Corporate Fleet) के लिए यह अनिवार्य करने की बात कही गई है कि वे केवल यूरोप में बनी इलेक्ट्रिक कारें ही खरीदें। हालांकि, जर्मनी तुरंत इस नियम का विरोध कर रहा है। बीएमडब्ल्यू के सीईओ ऑलिवर जिप्से का तर्क है कि कॉरपोरेट फ्लीट को पूरी तरह इलेक्ट्रिक बनाने का प्रयास "पीछे के दरवाजे से आंतरिक दहन इंजन (ICE) पर बैन लागू करने जैसा" होगा, जो बाजार के प्राकृतिक विकास को बाधित करेगा। इसके अतिरिक्त, बायोफ्यूल को छूट देने के इटली के प्रस्ताव पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। ट्रांसपोर्ट एंड एनवायरनमेंट के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बायोफ्यूल को छूट देना एक "गंभीर गलती" होगी, क्योंकि यह न तो प्रभावी रूप से कार्बन उत्सर्जन कम करता है, और न ही यह जंगल कटाई जैसी पर्यावरणीय समस्याओं को रोकने में सहायक है। यूरोप का यह ऊर्जा संक्रमण अब एक जटिल रस्साकशी में फंस गया है, जहाँ उद्योग के आर्थिक हित, सदस्य सरकारों के राष्ट्रीय दृष्टिकोण और कड़े पर्यावरणीय लक्ष्य एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं।

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