79वें स्वतंत्रता दिवस पर सतना जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों ने सरकार से सम्मान और योजनाओं की मांग उठाई। परिजनों का कहना है कि देश के लिए बलिदान देने वाले शहीदों और सेनानियों को वह सम्मान और सुविधाएं अब तक नहीं मिलीं, जिसके वे पात्र हैं।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
देश को आजाद कराने 1957 से प्रारंभ हुआ स्वतंत्रता आंदोलन रहा हो या फिर आजादी के बाद राष्ट्र के निर्माण व सुरक्षा का जिम्मा हो जिले के कई परिवारों के युवाओं ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया और आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राणों की आहुति भी मां भारती के चरणों में दी, लेकिन देश के लिए मर मिटने वाले इन रणबांकुरों को क्या वह सम्मान मिला, जिसके वे हकदार थे? यदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों की माने तो इसका जवाब न में ही मिलता है। स्वतंत्रता दिवस पर्व की पूर्व संध्या पर सेनानी परिवारों से स्टार समाचार ने जब चर्चा की तो सरकारी उपेक्षा और स्थानीय शहीदों को वाजिब सम्मान न मिलने का दर्द छलक उठा।
दूसरे राज्यों में व्यवस्था पर मप्र में उदासीनता
स्वतंत्रता आंदोलन में स्थानीय लोगों ने भी अपनी आहुतियां दी। पिंड्रा, माजन, महतैन जैसे इलाके कई शहादतों के गवाह बने । इन गांवों में आज भी उन शहीदों के वंशज रह रहे हैं और पूर्वजों के शहादत की गौरव गाथा को सहेजकर आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं लेकिन उनकी सबसे बड़ी पीड़ा शहीदों के प्रति बरती जा रही सरकारी उपेक्षा है। सेनानी परिवारों का कहना है कि उत्तराखंड, असम, पंजाब जैसे कई राज्यों में सरकारी सुविधाएं व सम्मान सरकार द्वारा दिया जा रहा है लेकिन मप्र में कभी किसी सरकार ने शहीदों व सेनानियों के लिए कोई योजना बनाई। सेनानी परिवारों ने सरकारी अतिथि ग्रहों में विश्राम सुविधा, बड़े शहरों में सेवा सदन, मार्गों व सरकारी भवनों का शहीदों के नाम पर नामकरण निकायों में कर्मचारी चयन में शहीद परिवारों को प्राथमिकता देने के अलावा सेनानी परिवारों को आयुष्मान कार्ड व टोल टैक्स से बचाव की सुविधा सरकार से मांगी है।
हमारे दादाजी शहीद बुद्धप्रताप सिंह ने माजन कांड मे अपने प्राणों की आहुति दी और पिता रिसाल सिंह भी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे, लेकिन उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। जहां मांजन कांड का स्मारक है, वह भी धूल धुसरित है। यदि सरकार कुछ नहीं कर सकती तो कम से कम माजन कांड के शहीदों के नाम गांव कोई स्मारक बने ताकि आगामी पीढ़ियां अपने पूर्वजों के बलिदान से सबक ले सकें।
जितेंद्र सिंह, वंशज, शहीद लाल बुद्ध प्रताप सिंह
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन्होने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई को अपने प्राणों का बलिदान देकर एक नई दिशा दी, उन्हें ही सरकार सम्मान नहीं दे पा रही है। सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की, सेनानियों की सबने उपेक्षा की। हमारे पूर्वज दलरंजन सिंह पर अंग्रेजों ने कई अत्याचार किए लेकिन वे अंतिम सांस तक उनसे लड़ते रहे। हम सरकार से केवल सम्मान चाहते हैं ताकि पूर्वजों की गौरवगाथा आगामी पीढ़ियों को भी देशसेवा के लिए प्रेरित कर सके।
अभय प्रताप सिंह, वंशज शहीद दलगंजन सिंह, पिंड्रा
हमारे दादा शहीद मनधीरन पांडे माजन कांड के दौरान अंग्रेजों के सामने डटकर खड़े रहे। बचपन से ही गांव में उनकी गौरव गाथा सुनते हुए बड़े हुए, लेकिन इस बात का क्षोभ है कि स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले उन शहीदों के लिए कुछ नही किया गया। कम से कम किसी सड़क या सरकारी भवन का नाम तो शहीदों के नाम पर किया ही जा सकता है।
बालगोविंद पांडेय, नाती शहीद मनधीरन पांडे
आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के लिए जिन लोगों ने अपने प्राणों का दान कर दिया उनके सम्मान के लिए सरकार को सामने आना चाहिए। माजन गांव आज भी बदहाली का शिकार है। शहीदों के स्मारक धूल धुसरित हैं। गांवो में बने स्कूल, सड़क या सरकारी भवनों का नाम शहीदों के नाम करना चाहिए ताकि सेनानियों की शहदात पर गर्व करने का सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे।
नंद किशोर द्विवेदी, ग्रामीण मांजन
निश्चित तौर पर स्थानीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को न तो इतिहास ने और न ही आजादी के बाद की सरकारों ने वह प्रतिष्ठा प्रदान की जिसके वे पात्र थे। आज हमारा देश यदि दुनिया में मजबूती से उभर रहा है तो उसकी जड़ में देश के लिए मर मिटने वाले सेनानी ही थे। सरकार उनका सम्मान करे, यही हमारी अभिलाषा है।
प्रमोद द्विवेदी, वंशज स्वतंत्रता सेनानी, पिंड्रा
कई प्रदेशों की सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सम्मान में योजनाएं चला रही हैं। मप्र में ऐसी कोई योजना नहीं है जिससे सेनानियों के परिवार सम्मान महसूस करें। अज जब राजनेताओं के नाम सड़क, चौराहे और मोहल्ले के नाम हैं तो स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता ?
राजीव द्विवेदी, वंशज, सेनानी परिवार
देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवारों के उत्थान के लिए सरकार को योजनाएं बनानी चाहिए ताकि देश पर मिटने का जज्बा रखने वाला युवा उनसे प्रेरित हो सके। उनकी स्मृति में कोई न कोई स्मारक उन गांवों में बनाना चाहिए जहां की माटी में शहीद जन्मे थे।
उमेश पयासी, वंशज, सेनानी परिवार
स्वतंत्रता के लिए विंध्य की पावन माटी में जन्मे जिन शहीदों ने अपना बलिदान दिया उनको अपेक्षित सम्मान नहीं मिला है। सरकार दूसरे राज्यों की तरह यहां भी नेनानियों के परिवारों के कल्याणार्थ योजनाएं संचालित करे।
कृष्णेंद्र सिंह वंशज, शहीद परिवार


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