आईआईटी दिल्ली में वर्ल्ड एसोसिएशन आफ हिंदू एकेडमिशियन के तत्वावधान में हिंदुत्व की शाश्वत प्रासंगिकता विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से 300 प्रोफेसर और शिक्षाविद शामिल हुए।
By: Arvind Mishra
Jan 05, 20262:53 PM

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
आईआईटी दिल्ली में वर्ल्ड एसोसिएशन आफ हिंदू एकेडमिशियन के तत्वावधान में हिंदुत्व की शाश्वत प्रासंगिकता विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से 300 प्रोफेसर और शिक्षाविद शामिल हुए। संगोष्ठी का विहिप के क्षेत्रीय संगठन मंत्री नीरज दनौरिया सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर विधिवत शुभारंभ किया। वहीं संगोष्ठी के शुरुआत में वर्ल्ड एसोसिएशन आफ हिंदू एकेडमिशियन (डब्ल्यूएएचए) के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. नचिकेत तिवारी ने कहा-हिंदुत्व और भारतीय संस्कृति को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां फैली हुई हैं। हिंदुत्व का मूल अधिष्ठान ज्ञान है, जिसमें वेद, बौद्ध दर्शन, भारतीय ज्ञान परंपरा, संत परंपरा और विविध भाषाओं का समावेश है। हिंदुत्व की मूल पहचान ही ज्ञान है।
भारत में शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष प्रो. केके अग्रवाल ने कहा- यदि भारत को विश्व गुरु बनना है, तो उसे हिंदुत्व के सिद्धांतों के अनुरूप आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि एक जीवन शैली है। राष्ट्र की शिक्षा नीति श्रीराम के सिद्धांतों से प्रेरित होनी चाहिए।
संगोष्ठी का प्रथम सत्र सामाजिक समरसता
हिंदू जीवन शैली का सार विषय पर केंद्रित रहा। इस सत्र में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष किशोर मकवाना ने कहा- सामाजिक समरसता के लिए बंधुत्व और एकात्मता की भावना जरूरी है, जिसके लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने निरंतर संघर्ष किया। हिंदुत्व के मूल में सामाजिक एकत्व निहित है, जो भारतीय राष्ट्रीय एकता के लिए अनिवार्य है। इस अवसर पर डॉ. केजी सुरेश ने कहा-सामाजिक समरसता एक सतत प्रक्रिया है। भारत इस दिशा में सही मार्ग पर अग्रसर है। उन्होंने कहा-शिक्षा पद्धति में मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है।
हिंदुत्व के सिद्धांतों ने संरक्षित किया
संगोष्ठी में दस गुरु परंपरा के ऐतिहासिक महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा-यदि यह परंपरा न होती, तो उत्तर-पश्चिम भारत विशेषकर पंजाब की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति अत्यंत जटिल हो सकती थी। भारत की संस्कृति और धर्म की अक्षुण्णता हजारों वर्षों के संघर्ष का परिणाम है, जिसे हिंदुत्व के सिद्धांतों ने संरक्षित किया।
पंजाब में धर्मांतरण जैसी चुनौतियां
दूसरा सत्र पंजाब की संस्कृति, चुनौतियां और परिवर्तन विषय पर आयोजित हुआ। इस सत्र में डॉ. अशमिंदर सिंह बहल ने कहा- पंजाब में युवाओं में नशे की समस्या बढ़ रही है, जिसका एक कारण पड़ोसी देश से जुड़ी परिस्थितियां भी हैं। युवाओं का निरंतर पलायन और धर्मांतरण जैसी चुनौतियां पंजाब की संस्कृति को प्रभावित कर रही हैं, जिनके समाधान के लिए सरकार को त्वरित और ठोस निर्णय लेने होंगे।
पंजाब की समस्याओं पर करना होगा विचार
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक ने कहा- पंजाब की समस्याओं पर निर्भीकता से विचार करना होगा। उन्होंने गुरु नानक देव, गुरु रविदास और गुरु परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा- एक ओंकार के मंत्र में निहित निर्भयता पंजाब की सांस्कृतिक शक्ति है। राजनीतिक स्वार्थों के कारण पंजाब में विद्वेष फैलाया गया, जबकि यह भूमि संस्कृत, धर्म और भारतीय परंपरा से एक रही है। बजरंग दल पंजाब में नशा मुक्ति के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
संगोष्ठी का तृतीय सत्र हिंदू मूल्य
सामाजिक परिवर्तन की दिशा विषय पर केंद्रित रहा, जिसमें इग्नू की कुलपति प्रो. उमा कांजीलाल ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गुरु शिष्य परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता, भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर अपने विचार प्रस्तुत किए और भारतीय मूल्यों की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। भारत के भविष्य एवं सामाजिक परिवर्तन के लिए मानवीय मूल्य को लेकर चलने की बात कही। कार्यक्रम के अंत में सभी वक्ताओं ने कहा- इस प्रकार की संगोष्ठियां भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।