भोपाल का रंगीन इतिहास! जानें कैसे राजा भोज से नवाबी दौर तक इस शहर ने अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति और तहज़ीब को संजोया। एक अनोखे भोपाली अंदाज़ में।

भोपाल आज....
भोपाल की बात भोपाली लहजे में... इस शहर का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प और रंगीन है, मियाँ! इसे भोपाली अंदाज़ में समझना हो तो यूँ कहिए कि ये शहर सिर्फ़ ईंट-पत्थरों का बना नहीं, बल्कि तहज़ीब, गंगा-जमुनी संस्कृति और सदियों पुरानी कहानियों का जीता-जागता नमूना है।
अरे हुज़ूर, भोपाल का किस्सा शुरू होता है परमार राजा भोज से, जिनके नाम पर कभी इसे 'भोजपाल' कहा जाता था। ये वो ज़माना था जब यहाँ बड़ी-बड़ी झीलें बनीं, जिनसे इस शहर की खूबसूरती में चार चाँद लग गए। राजा भोज ने ज्ञान और कला को खूब बढ़ावा दिया, तो आप समझ लो कि भोपाल की मिट्टी में ही इल्म और फन की खुशबू बसी है।
फिर कहानी आगे बढ़ती है और आती हैं रानी कमलापति, जिनकी हिम्मत और शराफ़त की दाद आज भी दी जाती है। उनकी वीरता और त्याग की मिसालें आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं, और उन्हीं की याद में यहाँ की एक बड़ी झील को 'कमला पार्क' कहा जाता है। मियाँ, ये शहर सिर्फ़ अपने नवाबों के लिए ही नहीं, बल्कि ऐसी ही वीरांगनाओं की वजह से भी मशहूर है।

18वीं सदी में कहानी में नया मोड़ आता है जब दोस्त मोहम्मद ख़ान आता है। ये अफ़ग़ान सिपाही था जिसने इस शहर को नई सूरत दी। भोपाल को एक रियासत के तौर पर मुकम्मल किया। उसके बाद उनकी बेगमात और नवाबी खानदान ने भोपाल को ऐसी शान बख्शी कि आज भी यहाँ की इमारतों, यहाँ की सड़कों और यहाँ के लोगों के लहजे में नवाबी झलक साफ नज़र आती है। इन नवाबों ने सिर्फ़ इमारतें ही नहीं बनवाईं, बल्कि शिक्षा, कला और तहज़ीब को भी खूब तरक्की दी।

यहाँ की बेगमात, जैसे क़ुदसिया बेगम, शाहजहाँ बेगम और सुल्तान जहाँ बेगम, ये सब सिर्फ़ पर्दों में रहने वाली नहीं थीं, बल्कि ये वो दूरंदेश बेगमात थीं जिन्होंने भोपाल को तरक्की की राह पर चलाया। उन्होंने स्कूल खुलवाए, अस्पताल बनवाए, रेलवे लाइनें डलवाईं और औरतों की तालीम पर खास ध्यान दिया। इनके दौर में भोपाल ने जो तरक्की देखी, वो अपने आप में एक मिसाल है। ये बेगमात सिर्फ़ अपनी सल्तनत ही नहीं चलाती थीं, बल्कि उन्होंने यहाँ की गंगा-जमुनी तहज़ीब को भी सींचा। होली-दीवाली हो या ईद-बकरीद, यहाँ सब त्यौहार मिल-जुलकर मनाए जाते थे।

आज का भोपाल, हुज़ूर, उसी नवाबी शान और ऐतिहासिक विरासत को समेटे हुए है। जहाँ एक तरफ़ पुराने शहर की तंग गलियाँ और उनकी इमारतें नवाबी दौर की कहानियाँ सुनाती हैं, वहीं नया भोपाल आधुनिकता की पहचान बन गया है। बड़ी झील और छोटी झील, यहाँ की जान हैं। शाम के वक़्त जब झील पर सूरज डूबता है, तो दिल खुश हो जाता है। ये शहर सिर्फ़ अपनी झीलों के लिए ही मशहूर नहीं, बल्कि यहाँ की ज़ायकेदार खाने, यहाँ की प्यारी बोली और यहाँ के मिलनसार लोग भी इसे खास बनाते हैं। भोपाल का इतिहास सिर्फ़ राजाओं, नवाबों और बेगमों का ही नहीं है, बल्कि ये उन आम लोगों की कहानियाँ भी समेटे हुए है जिन्होंने इस शहर को अपनी मेहनत और मोहब्बत से सींचा है। तो मियाँ, भोपाल को समझना हो तो बस कुछ दिन यहाँ गुज़ारो, ये शहर खुद अपनी कहानी तुमसे कहने लगेगा।




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