डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को खरीदने या कब्जे की चर्चाओं के बीच डेनमार्क ने 1952 का सैन्य नियम याद दिलाया है। जानें क्या है ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व और ट्रंप का $100,000 प्रति व्यक्ति वाला 'बिजनेस प्लान'।
By: Ajay Tiwari
Jan 09, 20265:42 PM
इंटरनेशनल डेस्क। स्टार समाचार वेब
उत्तरी अटलांटिक महासागर में स्थित दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप, ग्रीनलैंड, एक बार फिर महाशक्तियों के बीच खींचतान का केंद्र बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने की कथित योजनाओं के बीच डेनमार्क ने अपनी रक्षात्मक मुद्रा सख्त कर ली है। डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई विदेशी ताकत उनके संप्रभु क्षेत्र पर हमला करती है, तो डेनिश सैनिक बिना किसी शीर्ष कमान के आदेश के तुरंत जवाबी कार्रवाई करेंगे।
डेनमार्क ने अपने सैनिकों को 1952 के एक ऐतिहासिक सैन्य नियम की याद दिलाई है। यह नियम द्वितीय विश्व युद्ध के कड़वे अनुभवों के बाद बनाया गया था। 1940 में जब नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर हमला किया था, तब संचार व्यवस्था ठप होने के कारण सैनिक असमंजस में थे। इसके बाद यह कानून बना कि "विदेशी आक्रमण की स्थिति में सैनिकों को आदेश की प्रतीक्षा किए बिना लड़ना होगा और गोली चलानी होगी।" रक्षा मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि यह नियम आज भी पूरी तरह प्रभावी है।

व्हाइट हाउस के गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड को एक 'रियल एस्टेट डील' की तरह देख रहा है। सूत्रों का दावा है कि अमेरिका ग्रीनलैंड के प्रत्येक नागरिक को डेनमार्क से अलग होकर अमेरिका में शामिल होने के बदले 10,000 डॉलर से 1,00,000 डॉलर (करीब 90 लाख रुपये) तक देने पर विचार कर रहा है। ग्रीनलैंड की 57 हजार आबादी के हिसाब से यह सौदा लगभग 5 से 6 अरब डॉलर का बैठता है। इस योजना का मकसद स्थानीय लोगों को आर्थिक प्रलोभन देकर डेनमार्क के खिलाफ जनमत तैयार करना है।
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डोनाल्ड ट्रंप के इन दावों और 'कैश फॉर ग्रीनलैंड' योजना पर ग्रीनलैंड की सेमी-ऑटोनॉमस सरकार ने कड़ा ऐतराज जताया है। प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनका देश बिकाऊ नहीं है। हालिया सर्वे बताते हैं कि ग्रीनलैंड की 85% आबादी अमेरिकी कब्जे के विचार के सख्त खिलाफ है।
अमेरिका की ग्रीनलैंड में रुचि नई नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी कूटनीतिक और सैन्य वजहें हैं। पहली वजह अमेरिका के पास यहां पिटुफिक स्पेस बेस है, जो मिसाइल हमलों की निगरानी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दूसरा कारण बर्फ की चादर के नीचे छिपे दुर्लभ खनिज और तेल के भंडार पर अमेरिका की नजर है। तीसरी वजह रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ग्रीनलैंड पर नियंत्रण अमेरिका के लिए सामरिक रूप से अनिवार्य है।
ग्रीनलैंड पिछले 300 वर्षों से डेनमार्क के साथ जुड़ा हुआ है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, जब डेनमार्क नाजी कब्जे में था, तब अमेरिका ने ही ग्रीनलैंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली थी। 2004 में हुए रक्षा समझौते के तहत अमेरिका को यहां सैन्य गतिविधियां चलाने की अनुमति तो है, लेकिन संप्रभुता डेनमार्क के पास ही है।
सैन्य संघर्ष की नींव रख रहा अमेरिका
एक ओर ट्रंप प्रशासन इसे एक 'बिजनेस डील' के रूप में पेश कर रहा है, वहीं डेनमार्क इसे अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर हमला मान रहा है। क्या यह विवाद केवल जुबानी जंग तक सीमित रहेगा या आर्कटिक क्षेत्र में नए सैन्य संघर्ष की नींव रखेगा, यह आने वाला समय बताएगा।