धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म 'इक्कीस' रिलीज हो गई है। जानें कैसी है अगस्त्य नंदा और जयदीप अहलावत स्टारर यह फिल्म। क्या 1971 के युद्ध की यह अनकही कहानी आपके दिल को छू पाएगी? पढ़ें पूरा रिव्यू।
By: Ajay Tiwari
Jan 09, 20264:20 PM
एंटरटेंमेंट डेस्क. स्टार समाचार वेब
बॉलीवुड के 'ही-मैन' धर्मेंद्र एक आखिरी बार बड़े पर्दे पर अपनी चमक बिखेरने के लिए लौट आए हैं। उनकी बहुप्रतीक्षित फिल्म 'इक्कीस' (Ikkis) 1 जनवरी 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। श्रीराम राघवन के निर्देशन और मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बनी यह फिल्म 1971 के युद्ध के हीरो अरुण क्षेत्रपाल की वीरता और एक पिता के अंतर्द्वंद्व की मार्मिक दास्तां है।
कहानी: सरहदों के पार एक पिता का सफर
फिल्म की शुरुआत होती है एम.एल. क्षेत्रपाल (धर्मेंद्र) से, जो भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उनकी एक अंतिम इच्छा है—पाकिस्तान जाकर अपने कॉलेज की 'एलुम्नी मीट' में शामिल होना और अपने पुरखों की जमीन देखना। पाकिस्तान में उनकी मेजबानी करते हैं निसार (जयदीप अहलावत), जो खुद एक पाकिस्तानी सेना अधिकारी हैं।
कहानी में मोड़ तब आता है जब अतीत के पन्ने खुलते हैं। 1971 के युद्ध में एम.एल. क्षेत्रपाल का बेटा अरुण क्षेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) पाकिस्तान की जमीन पर लड़ते हुए शहीद हुआ था। एक पिता अब उस जगह को देखना चाहता है जहां उसके बेटे ने अंतिम सांस ली थी। निसार, जो खुद एक पिता है, इस भावुक अनुरोध को स्वीकार तो करता है, लेकिन उसके मन में एक ऐसा राज है जो फिल्म के क्लाइमेक्स तक दर्शकों को बांधे रखता है।
फिल्म की खूबियां (Highlights)
धर्मेंद्र की विरासत: दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र के निधन के बाद यह उनकी आखिरी फिल्म है। उन्हें पर्दे पर देखना प्रशंसकों के लिए एक इमोशनल रोलरकोस्टर की तरह है।
जयदीप अहलावत का जादू: जयदीप ने एक बार फिर साबित किया कि वे अभिनय के उस्ताद हैं। एक पाकिस्तानी अधिकारी के रूप में उनका संयमित अभिनय और चेहरे के भाव फिल्म की जान हैं।
अगस्त्य नंदा का उदय: अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने अरुण क्षेत्रपाल के किरदार में जबरदस्त परिपक्वता दिखाई है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस प्रभावशाली है और वे कई दृश्यों में अभिषेक बच्चन की याद दिलाते हैं।
इंसानियत का संदेश: आज के दौर में जहां 'पाकिस्तान-बैशिंग' वाली फिल्में ज्यादा बनती हैं, वहां श्रीराम राघवन ने नफरत के बजाय मानवीय संवेदनाओं और एक सैनिक के पीछे छिपे 'बेटे' की कहानी कहने का साहस दिखाया है।
फिल्म की कमियां (Weakness)
पटकथा में स्पष्टता का अभाव: फिल्म कुछ जगहों पर इस उलझन में नजर आती है कि वह एक युद्ध फिल्म (War Movie) है या एक इमोशनल ड्रामा। स्क्रिप्ट को थोड़ा और पैना बनाया जा सकता था।
धीमी गति: लार्जर दैन लाइफ एक्शन देखने वाले दर्शकों को फिल्म की धीमी रफ्तार और गहरा संवाद थोड़ा उबाऊ लग सकता है।
प्रस्तुति: एक शहीद की महानता को दिखाने के लिए जिस भव्यता और ठोस लेखन की जरूरत थी, वह कुछ दृश्यों में फीकी लगती है।
अभिनय और निर्देशन
श्रीराम राघवन ने हमेशा की तरह निर्देशन में अपना अलग अंदाज रखा है। उन्होंने युद्ध के मैदान से ज्यादा भावनाओं के मैदान पर ध्यान केंद्रित किया है। सिमर भाटिया ने अपने छोटे से रोल में न्याय किया है, वहीं राहुल देव, सिकंदर खेर और विवान शाह ने अपने सपोर्टिंग किरदारों से कहानी को मजबूती दी है।
'इक्कीस' सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि धर्मेंद्र को एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। अगर आप शोर-शराबे वाले एक्शन के बजाय गहराई वाली कहानियां पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि युद्ध चाहे कोई भी जीते, नुकसान हमेशा किसी न किसी 'बेटे' का ही होता है।
कलाकार: धर्मेंद्र, अगस्त्य नंदा, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया, राहुल देव, सिकंदर खेर आदि। निर्देशक: श्रीराम राघवन