भारत और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौता हुआ है। जानें कैसे भारत द्वारा रूसी तेल बंद करने और डिजिटल टैक्स हटाने से अमेरिकी बाजार के रास्ते खुले और टैरिफ में कमी आई।

वाशिंगट/नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न हुई ट्रेड डील को ट्रंप प्रशासन ने 'ऐतिहासिक' करार दिया है। व्हाइट हाउस द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, इस समझौते ने अमेरिकी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे पूरी तरह से खोल दिए हैं। इस डील के तहत अमेरिका ने भारत पर लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ को 25% से घटाकर 18% करने पर अपनी सहमति व्यक्त की है।
इस समझौते का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा कूटनीति से जुड़ा है। व्हाइट हाउस के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने रूसी तेल की खरीद बंद करने के नई दिल्ली के वादे को स्वीकार कर लिया है। इसके बदले में, अमेरिका भारतीय आयात पर लगाए गए अतिरिक्त 25% टैरिफ को हटाने के लिए तैयार हो गया है। यह कदम दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव को कम करने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।
समझौते के तहत भारत ने अमेरिकी औद्योगिक सामानों और कृषि उत्पादों पर टैरिफ को या तो पूरी तरह खत्म करने या काफी कम करने का निर्णय लिया है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित उत्पाद शामिल हैं:
कृषि उत्पाद: लाल ज्वार, ट्री नट्स, सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन (DDGs), और सोयाबीन तेल।
खाद्य सामग्री: ताजे और प्रोसेस्ड फल, दालें, वाइन और स्पिरिट्स।
औद्योगिक सामान: सभी प्रमुख अमेरिकी इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स।
नई दिल्ली ने व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए एक बड़ा वादा किया है। भारत आने वाले समय में अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर से अधिक मूल्य के उत्पादों की खरीद करेगा। इस खरीद में ऊर्जा (Energy), सूचना एवं संचार तकनीक (ICT), कृषि कोयला और अन्य महत्वपूर्ण अमेरिकी उत्पाद शामिल होंगे।
व्यापार को सुगम बनाने के लिए भारत ने प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में 'नॉन-टैरिफ' बाधाओं को दूर करने पर भी सहमति जताई है। एक बड़ा बदलाव करते हुए भारत अपने डिजिटल सर्विस टैक्स को हटा देगा। साथ ही, दोनों देश मजबूत द्विपक्षीय डिजिटल व्यापार नियमों पर बातचीत करेंगे, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने का नियम भी शामिल है।
भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए, अमेरिका और भारत ने टेक्नोलॉजी उत्पादों में आपसी व्यापार और सहयोग को बढ़ाने का संकल्प लिया है। इसके अलावा, दोनों देश 'उत्पत्ति के नियमों' (Rules of Origin) पर भी चर्चा करेंगे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इस डील का अधिकतम लाभ केवल भारत और अमेरिका को ही मिले, किसी तीसरे देश को नहीं।

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