जबलपुर के नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में 40 एसोसिएट प्रोफेसर पदों की सीधी भर्ती को हाईकोर्ट ने याचिका के अधीन रखा है। जानें क्या है पदोन्नति विवाद और कोर्ट का आदेश।
By: Star News
Jan 19, 20265:21 PM
जबलपुर. स्टार समाचार वेब
जबलपुर स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर होने वाली सीधी भर्ती अब कानूनी पेच में फंस गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) द्वारा की जा रही यह भर्ती प्रक्रिया अब याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगी। जस्टिस विशाल धगट की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार, कर्मचारी चयन मंडल और भारतीय नर्सिंग काउंसिल को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
विवाद की जड़ साल 2024 में स्वीकृत हुए एसोसिएट प्रोफेसर के 40 नए पद हैं। याचिकाकर्ताओं, जिनमें डॉ. प्रवीण सूर्यवंशी और डॉ. श्वेता ठाकुर सहित अन्य शामिल हैं, का तर्क है कि नियमानुसार इन पदों को पदोन्नति (Promotion) के माध्यम से भरा जाना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि मेडिकल कॉलेज में पहले से ही 12 महिला डॉक्टर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं, जो एसोसिएट प्रोफेसर बनने की पूरी योग्यता और अनुभव रखती हैं। इसके बावजूद शासन ने पदोन्नति की प्रक्रिया को दरकिनार कर इन पदों के लिए सीधी भर्ती का विज्ञापन निकाल दिया।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से मौखिक आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा गया कि विशेष परिस्थितियों में पदोन्नति संभव न होने पर सीधी भर्ती की जा सकती है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं पंकज दुबे, अजीत शुक्ला और सोनाली पांडे ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार के पास पदोन्नति न करने का कोई स्पष्ट कारण नहीं है, जबकि योग्य उम्मीदवार वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद भर्ती को सशर्त जारी रखने का निर्देश दिया है, जिसका अर्थ है कि भविष्य में कोर्ट का फैसला भर्ती को निरस्त भी कर सकता है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है। इस आदेश के बाद अब उन डॉक्टरों में उम्मीद जगी है जो लंबे समय से पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे थे। वहीं, सीधी भर्ती के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के लिए भी अब यह प्रक्रिया अनिश्चितता के घेरे में आ गई है। यदि कोर्ट याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो शासन को पहले पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।