मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर, जो विंध्य की शान और सफेद शेर का घर है, 10 वर्षों में भी सालाना 3.5 लाख पर्यटक नहीं जुटा सका। खराब ट्रांसपोर्टेशन, सीमित ब्रांडिंग और प्रशासनिक उदासीनता इसकी मुख्य वजह हैं। खर्च ज्यादा और आमदनी कम बनी चुनौती।

हाइलाइट्स
रीवा, स्टार समाचार वेब
मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर देश की शान है। देश और विदेशों में इसकी ब्रांडिंग की गई लेकिन पर्यटक चाह कर भी यहां नहीं पहुंच पा रहे। लाख कोशिशों के बाद भी 10 सालों में औसत प्रति वर्ष साढ़े तीन लाख का आंकड़ा पार नहीं कर पा रहे। विदेशों से सैलानी पहुंच रहे लेकिन अपने ही क्षेत्र के पर्यटक इस खूबसूरती को निहारने और गौरव का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं। ट्रांसपोर्टर की कमी चिड़ियाघर की इनकम पर असर डाल रही है। अब यहां के अधिकारी प्रयास कर थक चुके हैं। मप्र सरकार से ही पहल की आस लगाए बैठे हैं।
आपको बता दें कि रीवा ने ही विश्व को सफेद शेर दिया था। पहला सफेद बाघ मोहन विंध्य में ही मिला था। 40 साल बाद विंध्या के रूप में मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर में सफेद बाघ की वापसी हुई थी। सफेद बाघ को कुनवा बढ़ाने के लिए कई प्रयास हुई। देश के अलग अलग हिस्सों से सफेद बाघ लगाए गए। अब यहां सफेद बाघ का कुनबा बढ़ाने की भी कोशिश चल रही है। यहां व्हाइट टाइगर सफारी भी है। यह विंध्य में पर्यटन का सबसे बड़ा केन्द्र है फिर भी पर्यटक यहां पर्याप्त संख्या में नहीं पहुंच पा रहे हैं।
पिछले 10 सालों से यहां पर्यटकों की संख्या बढ़ाने की कोशिश की जा रही है लेकिन मुख्य मार्ग से अलग शहर से दूर होने के कारण यहां तक पर्यटक पर्याप्त संख्या में पहुंच ही नहीं पाते। ऐसा नहीं है कि आसपास के जिलों में पर्यटकों की भीड़ नहीं आती लेकिन ट्रांसपोर्टेशन और ब्रांडिंग के कारण पर्यटक यहां नहीं पहुंच पाते। मुकुंदपुर चिड़िया घर मैहर जिला में शामिल हो गया है। पहले सतना में था। सतना और मैहर दोनों ही धार्मिक स्थल हैं। यहां लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पूरे देश और विश्व से आते हैं लेकिन प्रशासन उन्हें यहां तक नहीं खींच पा रहा है। यही वजह है कि साल में अधिकतम 3.50 लाख तक पर्यटकों की संख्या सिमट कर रह गई है। इससे अधिक संख्या बढ़ ही नहीं पा रही है। मप्र सरकार नए चिड़ियाघर बना रही है लेकिन जो बने हैं। उन्हें ही बढ़ावा नहीं दे पा रही है।
पर्यटकों की संख्या नहीं बढ़ पा रही, ट्रांसपोर्टेशन की है कमी
मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर पर्यटकों को नहीं खींच पा रहा है। यहां तक पहुंचना सबसे बस की बात नहीं है। ट्रांसपोर्टेशन सबसे बड़ी समस्या है। कोई भी वाहन सीधे चिड़ियाघर तक नहीं जाता। रीवा, सीधी, सतना और मैहर तक पर्यटक आते भी हैं तो ट्रांसपोर्टेशन के कारण चिड़ियाघर तक नहीं पहुंच पाते। इसके अलावा रीवा से निपनिया होते हुए एक सड़क सीधे मुकुंदपुर को जोड़ती है। वह भी खराब हो चुकी है। इसके कारण भी रीवा के पर्यटक वहां तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। ट्रांसपोर्टेशन सबसे बड़ी समस्या है। यदि यह समस्या हल हो जाए तो संख्या और कमाई दोनों बढ़ जाएगी।
खर्चे भी कम नहीं, जितना कमाते हैं उससे अधिक लग जाता है
चिड़ियाघर में खर्चों की कमी नहीं है। साल में करीब 2 करोड़ के आसपास चिड़ियाघर को पर्यटकों से इंकम होती है। वहीं इससे कहीं ज्यादा चिड़ियाघर के प्रबंधन में खर्च हो जाता है। यहां वन्यजीवों के खानपान से लेकर कर्मचारियों के वेतन, चिड़ियाघर में चलने वाले वाहनों का खर्च शामिल है। इसके अलावा सबसे अधिक खर्च रेस्क्यू सेंटर में खर्च होता है। यहां आने वाले वन्यजीवों का इलाज और उनकी दवाइयां ही महंगी पड़ती है। दवाइयां और इंजेक्शन काफी महंगे आते हैं।
गर्मी में घट जाते हैं पर्यटक
मार्तण्ड सिंह जूदेव चिड़ियाघर में ठंडी और गर्मी में पर्यटकों की संख्या में भारी अंतर आ जाता है। ठंडी में पर्यटक बढ़ जाते हैं तो गर्मी में आधे रह जाते हैं। यदि एक नजर ठंड के समय के पर्यटकों पर डालें तो रिकार्ड चौकाने वाले हैं। 19 जनवरी को पर्यटकों की संख्या 2418 तक रिकार्ड की गई। वहीं यदि जून की गर्मी पर नजर डालें तो सबसे अधिक 25 जून को सिर्फ 1 हजार 552 ही पर्यटक आए थे। पर्यटकों की संख्या में ज्यादा इजाफा नहीं हो पा रहा है।


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