धारकुंडी आश्रम में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज को भू-समाधि दी गई। यह केवल एक संत की विदाई नहीं, बल्कि करुणा, तप, संयम और मौन साधना से भरे युग का शांत अवसान है।
By: Yogesh Patel
Feb 10, 20267:09 PM
हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
सोमवार का चटक आकाश भी जैसे मौन होकर शोक में डूब गया। परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज का समाधिलीन होना केवल दैहिक विसर्जन नहीं अपितु करुणा से भरे एक युग का शांत अवसान था। वैदिक मंत्रों की करुण ध्वनियों के मध्य धारकुंडी महाराज को परंपरानुसार समाधि दी गई। इस क्षण सुदूर से भागे-दौड़े आए श्रद्धालुओं की सिसकियां वातावरण में घुल गईं। असंख्य नेत्रों से अश्रुधारा बहती रही...हृदय गुरू-विरह में विह्वल हो उठे। जिन्होने जीवन भर प्रेम..क्षमा..करुणा बांटी ...वे आज मौन होकर अनंत में विलीन हो गए। उनका स्पर्श भले न रहा पर उनकी करुणा हर श्वास में सदा जीवित रहेगी....।
अनवरत गूंजते रहे मंत्र
मौजूद आचार्यों व गुरूजनों ने बताया कि परमहंस परंपरा में ‘समाधि’ केवल ध्यान की सर्वोच्च अवस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि एक सिद्ध महापुरुष को दी जाने वाली अत्यंत पवित्र अंतिम विदाई की विशिष्ट प्रक्रिया भी है। इस परंपरा में परमहंस गुरू का दाह-संस्कार नहीं किया जाता। उन्हें अग्नि से मुक्त मानते हुए, पद्मासन या सिद्धासन में ध्यान मुद्रा में बैठाकर भूमि में समाधि दी जाती है, जिसे भू-समाधि कहा जाता है। सोमवार को आश्रम में इसी प्राचीन संन्यासी परंपरा का पूर्ण विधि-विधान के साथ पालन किया गया। स्वामी सच्चिदानंद महाराज को समाधि स्थल पर ध्यान मुद्रा में बिठाकर ‘ब्रह्मलीन’ किया गया। इस दौरान पूरा परिसर ॐ और वैदिक मंत्रों से गूंजता रहा, वहीं श्रद्धालुओं की आंखों से आंसू स्वत: बहते रहे। परमहंस परंपरा में समाधि स्थल को केवल स्मृति-स्थल नहीं, बल्कि साधना और तपस्या का जीवंत केंद्र माना जाता है। यह स्थान शरीर की नश्वरता और आत्मा की शाश्वत यात्रा का प्रतीक होता है। आश्रम के संतों और अनुयायियों का मानना है कि स्वामी जी की समाधि आने वाली पीढ़ियों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बनेगी। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से आए अनेक सिद्ध संत, महात्मा और साधक उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से वीरेंद्र बाबा, रामायण बाबा, जगदीश महाराज, मुकुंद महाराज, जगतमोहन महाराज लेब्राटा आश्रम जबलपुर, मुकुंद महाराज झिरिया आश्रम सागर, श्री नारद महाराज (सक्तेषगढ़), श्री राजेश्वरानंद (राजकोट, गुजरात), स्वामी गिरिजानंदजी (जयपुर, राजस्थान), श्री पूर्णनादजी पप्पू बाबा (उज्जैन), हरिओम महाराज (पहाड़गंज, दिल्ली), पवन बाबाजी (अनुसूइया), गणेशानंद महाराज (लौधना), हनुमान बाबा (कल्याण), नवीनानंद महाराज (मंडीदीप, भोपाल), बहादुर महाराज (सतना), साधु महाराज (गाजीपुर), रंगनाथ बाबा (रंगकोला) सहित अनेक संत-महात्मा मौजूद रहे। इसके साथ ही परमहंस विद्यापीठ के बच्चों ने भी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। धारकुंडी आश्रम में यह दृश्य केवल विदाई का नहीं था, बल्कि उस तप, त्याग और साधना का साक्षी था, जिसने स्वामी सच्चिदानंद महाराज को एक संत से संस्था और एक व्यक्ति से परंपरा बना दिया।
समाधि नहीं साधना का शिखर बनेगा स्थल
जिस निर्माणाधीन मंदिर में महाराज को समाधि दी गई है, वह स्थान आगे चलकर भव्य मंदिर के रूप में विकसित होगा। विभिन्न कक्षों में परमहंस स्वामी के विविध स्वरूपों की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी और शिखर पर शिवलिंग विराजमान होगा। यह स्थल केवल स्मृति नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था, अनुशासन और साधना का केंद्र बनेगा।

मौन टूट गया और धारकुंडी रो पड़ी
सतना की पूर्व महापौर ममता पांडे भी आस्था और शोक में डूबी नजर आईं। वे बीते 48 घंटे से आश्रम में सेवा करती नजर आईं और समाधिस्थल तक सिर में कलश लेकर पहुंचीं। समाधिस्थल तक वे जबलपुर से आई नेहा सिंह फूट-फूटकर रोने लगीं। वे बार-बार यही कहती रहीं कि महाराज के चरणों में ही तो जीवन की दिशा मिली थी। सीधी जिले की जनकदुलारी की आंखों से अश्रुधारा थमने का नाम नहीं ले रही थी। पास खड़ी महिलाएं उन्हें संभालने का प्रयास करती रहीं। आश्रम से लगे गांवों की महिलाएं मालती, जमुनिया और सविता तो बिलख-बिलखकर रो पड़ीं। वर्षों तक जिन संत ने बिना भेदभाव अन्न, आश्रय और आशीर्वाद दिया, आज उनके मौन शरीर के सामने शब्द साथ छोड़ गए। , प्रदीप समदड़िया, जुगुलकिशोर तिवारी कटनी जैसे अनेक गणमान्यजन भी अपने आंसू नहीं रोक सके। बचपन से ही आश्रम में आस्था के साथ माथा टेकने पहुचने वाले अनिल पांडे भी भावुक होक उठे। किसी ने गुरु को पिता कहा, किसी ने मार्गदर्शक, तो किसी ने जीवन की अंतिम आशा।

मन शोक से भरा है पर आस्था और गहरी हुई
समाधिलीन होने के साक्षी स्टार ग्रुप के चेयरमैन रमेश सिंह भी बने । इस अवसर पर उन्होने अपनी आदरांजलि देते हुए कहा कि महाराजश्री स्वामी सच्चिदानंद महाराज का ब्रह्मलीन होना मेरे जैसे असंख्य लोगों के लिए निजी क्षति के समान है। मैंने उन्हें केवल संत के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले मौन गुरु के रूप में जाना। उनकी वाणी कम थी, किंतु उनके आचरण में ऐसा तेज था जो स्वत: साधक को आत्मचिंतन की ओर ले जाता था। उन्होंने कभी उपदेश नहीं थोपे, बल्कि अपने तप, संयम और सरल जीवन से सत्य को प्रकट किया। आज जब वे देह से विदा हुए हैं, मन शोक से भरा है, पर आस्था और भी गहरी हो गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने देह छोड़ी नहीं, बल्कि समाधि में प्रवेश कर साधकों के लिए स्थायी प्रकाश बन गए हैं। स्वामी जी की साधना, करुणा और वैराग्य आने वाली पीढ़ियों को भी सही मार्ग दिखाती रहेगी। हम उन्हें अश्रुपूरित नमन करते हैं।
स्वामी सच्चिदानंद महाराज का ब्रह्मलीन होना संन्यासी परंपरा के लिए एक गहन शून्य है। वे केवल तपस्वी नहीं, बल्कि मौन में उपदेश देने वाले सिद्ध पुरुष थे। उनके सान्निध्य में बैठना ही साधना हो जाता था। उन्होंने जीवन भर वैराग्य, संयम और करुणा का जो मार्ग दिखाया, वह आज के समय में दुर्लभ है। उनकी समाधि कोई अंत नहीं, बल्कि एक जाग्रत चेतना का स्थायी केंद्र है। ऐसे संत युगों में जन्म लेते हैं और युगों तक मार्गदर्शन करते हैं।
चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय, पूर्व मंत्री, उप्र शासन
गुरुदेव का जाना ऐसा है जैसे सिर से छाया हट गई हो। उन्होंने हमें शब्दों से कम और आचरण से अधिक सिखाया। जब भी जीवन में भ्रम हुआ, गुरुदेव का मौन ही समाधान बन गया। आज आंखें नम हैं, पर मन में यह विश्वास भी है कि वे समाधि में और अधिक सशक्त होकर साधकों का मार्ग प्रशस्त करेंगे। गुरुदेव का हर श्वास तपस्या था, हर दृष्टि करुणा।
सुरेंद्र सिंह गहरवार, विधायक चित्रकूट
स्वामी सच्चिदानंद महाराज का योगदान केवल आध्यात्मिक नहीं, सामाजिक भी रहा। उन्होंने क्षेत्र में शांति, सद्भाव और नैतिकता का वातावरण बनाया। उनका जाना समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। स्वामी सच्चिदानंद महाराज जैसे संत दीपस्तंभ थे। उन्होंने हमें बताया कि साधना पलायन नहीं, बल्कि समाज के बीच रहते हुए आत्मसंयम है। उनका जीवन सादगी की जीवंत मिसाल था। उनके जाने से एक मार्गदर्शक देह से विदा हुआ, पर उनका दर्शन विचारों में जीवित रहेगा।
डा. राजेंद्र सिंह, पूर्व विस उपाध्यक्ष व अमरपाटन विधायक
महाराज जी देवतुल्य थे। उन्होंने कभी भेद नहीं किया। गरीब, अमीर, पढ़ा-लिखा या अनपढ़। सबके लिए एक-सा आशीर्वाद। खेत में काम करते समय भी उनका नाम स्मरण में रहता था। आज मन भारी है, लेकिन विश्वास है कि उनकी समाधि से गांव-गांव में शांति फैलेगी।
राजमणि पटेल, पूर्व राज्यसभा सदस्य
कई दशकों से स्वामी जी के दर्शन कर रहा था। उनके शब्द कम, प्रभाव गहरा होता था। आज आंखें नम हैं, लेकिन हृदय में संतोष है कि ऐसे महापुरुष का सान्निध्य मिला। वे देह से गए हैं, पर चेतना में सदा रहेंगे। उनकी समाधि आस्था का केंद्र बनेगी।
नीलांशु चतुर्वेदी, पूर्व विधायक
मैंने उन्हें बहुत पास से देखा। उनकी दिनचर्या कठोर तप से भरी थी। वे पहले उठते और सबसे बाद में विश्राम करते। मैं एसडीओपी रहा और छत्तीसगढ़ चला गया लेकिन वे मन में ऐसे बसे थे कि फिर मैं बदलापुर आश्रम में रहकर सेवा में लीन हो गया। सेवक होने के बावजूद उन्होंने कभी हमें छोटा महसूस नहीं होने दिया। आज आश्रम सूना-सा लग रहा है, लेकिन हर दीवार में उनकी साधना बसती है।
महेंद्र गर्ग, अनुयायी , बदलापुर आश्रम मुंबई
गुरुदेव बच्चों को भविष्य की धरोहर मानते थे। वे कहते थे, संस्कार ही सबसे बड़ा धन है। गुरुकुल के बच्चों पर उनका विशेष स्नेह था। आज बच्चों की आंखों में भी आंसू हैं। गुरुदेव ने जो संस्कार बोए हैं, वे पीढ़ियों तक फल देंगे।
कमलेशानंदजी महाराज, मिर्जापुर
स्वामी सच्चिदानंद महाराज एक सिद्ध पुरूष थे जिन्होने समाज को बिना शोर के बहुत कुछ दिया। न प्रचार, न प्रदर्शन केवल सेवा। उन्होंने बताया कि सच्चा संत वही है जो स्वयं पीछे रहे और समाज आगे बढ़े। उनका ब्रह्मलीन होना आध्यात्मिक जगत की अपूरणीय क्षति है।
दिव्यानंदजी, परमहंस आश्रम, राजस्थान
महाराज कोई सामान्य संत नहीं थे। वे पुण्यात्मा थे, सद्गुणों का साकार स्वरूप। उन्होंने ‘मानस बोध’ जैसे ग्रंथ रचे, जो आने वाली पीढ़ियों को युगों तक राह दिखाएंगे। उनके जीवन में ग्रंथ ही गुरु थे और गुरु ही ग्रंथ। वे केवल तपस्वी नहीं, बल्कि मौन में उपदेश देने वाले सिद्ध पुरुष थे। उनके सान्निध्य में बैठना ही साधना हो जाता था।
हरिओम बाबा, दिल्ली पहाड़गंज
स्वामी जी मेरे लिए संत नहीं, परिवार के बुजुर्ग जैसे थे। उनके दर्शन मात्र से मन हल्का हो जाता था। जब भी दुख आया, आश्रम की सीढ़ियां चढ़ते ही शांति मिलती थी। उनके ब्रह्मलीन होने का समाचार सुनकर आंखें भर आईं, लेकिन यह भी लगा कि वे देह से नहीं, केवल दृष्टि से ओझल हुए हैं। उनकी कृपा हमेशा बनी रहेगी।
रवि बाबा, जालौन