गाजियाबाद के हरीश राणा पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में हैं। उनके माता-पिता की पैसिव यूथेनेसिया (इच्छामृत्यु) की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला रिजर्व कर लिया है।
By: Ajay Tiwari
Jan 15, 20262:08 PM
नई दिल्ली: स्टार समाचार वेब
पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था (Vegetative State) में बिस्तर पर पड़े गाजियाबाद के निवासी हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस हृदयविदारक मामले की पूरी सुनवाई के बाद निर्णय रिजर्व किया है, जो देश में 'पैसिव यूथेनेसिया' (Passive Euthanasia) के नियमों को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है।
हरीश राणा एक ऐसी स्थिति में हैं जहां वे न तो हिल सकते हैं और न ही बोल सकते हैं। उनके माता-पिता ने शीर्ष अदालत को बताया कि उनका बेटा पिछले 13 सालों से एक 'जिंदा लाश' की तरह जीवन जीने को मजबूर है। 100 फीसदी शारीरिक अक्षमता के चलते उनके बुजुर्ग माता-पिता अब उनकी देखरेख करने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं और इसी अपार पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है।
इस मामले में एम्स (AIIMS) के मेडिकल बोर्ड द्वारा पेश की गई रिपोर्ट ने अदालत को भी भावुक कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, हरीश के स्वास्थ्य में सुधार की कोई भी गुंजाइश नहीं बची है। एम्स की इस रिपोर्ट को देखने के बाद बेंच ने इसे "बेहद दुखद" बताया। जस्टिस पारदीवाला ने सुनवाई के दौरान कहा कि "यह हमारे लिए एक बेहद मुश्किल और जटिल फैसला है, लेकिन हम इस लड़के को इस तरह के अंतहीन दर्द में नहीं छोड़ सकते।"
अदालत ने फैसला सुरक्षित रखने से पहले 13 जनवरी को हरीश के माता-पिता को व्यक्तिगत रूप से बातचीत के लिए बुलाया था। बेंच ने उनके संघर्ष को समझा और स्वीकार किया कि मामला अब उस स्थिति में पहुंच गया है जहां आखिरी निर्णय लेना अपरिहार्य है। कोर्ट ने संकेत दिया कि वे मानवीय दृष्टिकोण और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन बनाकर ही कोई रास्ता निकालेंगे।