भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (BMHRC) की साइटोजेनेटिक लैब इंडियन बायोडोसिमीट्री नेटवर्क (IN-BioDoS) में शामिल हो गई है। यह उपलब्धि BMHRC को मध्य भारत का पहला और इकलौता संस्थान बनाती है जो रेडिएशन आपदा की स्थिति में वैज्ञानिक आकलन और सटीक इलाज में मदद करेगा। जानें कैसे काम करेगा यह महत्वपूर्ण नेटवर्क।

भोपाल: स्टार समाचार वेब.
राजधानी के भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) ने एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। देशभर में चुनिंदा संस्थानों को शामिल कर बनाए गए इंडियन बायोडोसिमीट्री नेटवर्क (IN-BioDoS) में बीएमएचआरसी की साइटोजेनेटिक प्रयोगशाला को शामिल किया गया है। इस महत्वपूर्ण कदम के साथ, बीएमएचआरसी मध्य भारत का पहला और एकमात्र संस्थान बन गया है, जिसे इस राष्ट्रीय नेटवर्क में स्थान मिला है।
रेडिएशन से बचाव में नेटवर्क की भूमिका
देश में परमाणु ऊर्जा, उद्योग और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में रेडिएशन का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। विशेष रूप से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में रेडियोथेरेपी जैसी तकनीकों का व्यापक प्रयोग हो रहा है। ऐसी किसी भी स्थिति में, यदि रेडिएशन का रिसाव होता है या किसी व्यक्ति को अनजाने में अत्यधिक मात्रा में रेडिएशन का एक्सपोजर हो जाता है, तो डॉक्टरों के लिए इलाज शुरू करने से पहले यह जानना महत्वपूर्ण होता है कि मरीज कितनी मात्रा में रेडिएशन से प्रभावित हुआ है। बायोडोसिमीट्री वह वैज्ञानिक तरीका है जिससे यह सटीक रूप से पता लगाया जाता है कि व्यक्ति के शरीर में रेडिएशन की कितनी मात्रा गई है। यह जानकारी डॉक्टरों को सही समय पर सही इलाज शुरू करने में मदद करती है।
बीएमएचआरसी की प्रयोगशाला का कार्य
बीएमएचआरसी के अनुसंधान विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. रविंद्र एम. समर्थ ने बताया कि उनकी साइटोजेनेटिक लैब अब रेडिएशन से प्रभावित व्यक्तियों के रक्त नमूनों की जांच कर यह बता सकेगी कि उन्हें कितना नुकसान हुआ है। इस तकनीक का उपयोग विशेष रूप से आपातकालीन परिस्थितियों में किया जाएगा, जैसे परमाणु संयंत्र में दुर्घटना, अस्पताल में उपकरण की खराबी या किसी प्रकार की रेडिएशन घटना। यह लैब अब देश की अन्य प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं के साथ मिलकर आम लोगों पर हुए रेडिएशन के असर का वैज्ञानिक आकलन करेगी और जांच व इलाज की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
देशभर में केवल 6 संस्थानों का चयन
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा शुरू किए गए इस नेटवर्क में देशभर से केवल 6 संस्थानों को चुना गया है। बीएमएचआरसी के अलावा, इसमें चेन्नई, दिल्ली, लखनऊ, मंगलुरु और कलपक्कम की प्रयोगशालाएं शामिल हैं। ये सभी मिलकर देश में रेडिएशन से निपटने की वैज्ञानिक क्षमता को बढ़ाएंगी।
रेडिएशन के प्रभाव का आकलन
डॉ. समर्थ ने समझाया कि जब किसी व्यक्ति को अत्यधिक रेडिएशन का असर होता है, तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव शरीर की कोशिकाओं में मौजूद क्रोमोसोम पर पड़ता है। रेडिएशन से क्रोमोसोम में टूट-फूट, असामान्य जुड़ाव या अतिरिक्त संरचनाएं बन सकती हैं, जो शरीर के लिए खतरनाक साबित होती हैं। बीएमएचआरसी की साइटोजेनेटिक लैब में मरीज के खून के नमूने लेकर विशेष जैविक तकनीकों जैसे डायसेंट्रिक क्रोमोसोम एसे (DCA) और माइक्रोन्यूक्लियस एसे के माध्यम से यह पता लगाया जाता है कि रेडिएशन से क्रोमोसोम में कितनी और किस प्रकार की क्षति हुई है। उदाहरण के लिए, डायसेंट्रिक क्रोमोसोम का बनना रेडिएशन के प्रभाव का एक पुख्ता संकेत होता है, और उनकी संख्या के आधार पर यह आकलन किया जाता है कि मरीज को कितना रेडिएशन डोज़ लगा है। यह वैज्ञानिक पद्धति समय रहते सटीक इलाज संभव बनाती है और रेडिएशन से होने वाले गंभीर प्रभावों को रोकने में मदद करती है।

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