सतना नगर निगम का जीपीएफ घोटाला अब और गहराता जा रहा है। आरोप सिद्ध होने और आरोपी से राशि की वसूली होने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। पीड़ित कर्मचारियों के खाते में पैसे वापस नहीं डाले गए। सवाल उठ रहा है कि क्या केवल बाबू को बलि का बकरा बनाया जा रहा है और असली गुनहगार बचाए जा रहे हैं?

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
जीपीएफ घोटाले का असल मास्टर माइंड कौन है और किसे बचाने की कोशिशें चल रही हैं यह सवाल नगर निगम के हर उस कर्मचारी के जेहन में उठ रहा है जिसे इस घोटाले की पूरी कैफियत पता है। दरअसल, नगर निगम में पिछले कुछ समय से सुर्खियों में रहे जीपीएफ घोटाले में आरोप सिद्ध हो जाने, दोषी से पैसे की वसूली होने के बावजूद अभी तक संबंधित के खिलाफ न तो नगर निगम में एफआईआर दर्ज कराई है और न ही जिन कर्मचारियों के खाते से पैसे की निकासी हुई थी उनके खाते में पैसे डाले गए हैं। इसीलिए यह सवाल उठ रहा है कि यदि जीपीएफ शाखा का बाबू इस पूरे घोटाले के लिए जिम्मेदार है तो उसके खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई जा रही है? जिम्मेदारों को किस बात का डर है? यहां उल्लेखनीय है कि लगभग जनवरी माह में नगर निगम में जीपीएफ घोटाला सामने आया था जिसमें आरोप लगे थे कि शाखा के बाबू अभिलाष श्रीवास्तव ने दस से 12 कर्मचारियों के खाते से 9 से 10 लाख रुपए जीपीएफ खाते से निकाल लिए। मामला सामने आने के बाद नगर निगम आयुक्त ने आरोपी को निलंबित करते हुए तत्कालीन उपायुक्त भूपेन्द्र देव सिंह परमार की अध्यक्षता में एक जांच टीम बनाई थी। देवेन्द्र पांडेय, अनिल श्रीवास्तव एवं सुनील जाट इस टीम में शामिल किए गए थे। टीम द्वारा दिए गए जांच प्रतिवेदन के आधार पर आरोपी अभिलाष श्रीवास्तव से राशि की वसूली तो कर ली गई लेकिन अभी तक यह राशि उन कर्मचारियों के खाते में नहीं डाली गई जिनके खाते से निकाली गई थी।
रिटायर के कगार पर कई कर्मचारी
जीपीएफ घोटाले में जिन कर्मचारियों के खाते से पैसे निकाले गए थे उनमें से कई कर्मचारी तो ऐसे हैं जो अब रिटायर की कगार पर पहुंच गए हैं। अगर सिर्फ एक कर्मचारी की ही बात करें तो राजस्व शाखा में पदस्थ राजस्व निरीक्षक एसडी सेन सितम्बर माह में रिटायर होने जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इनके भी जीपीएफ खाते से लगभग 1 से डेढ़ लाख रुपए निकाल लिए गए थे।
अन्य घोटालों की तरह न हो जाए हश्र
नगर निगम में कई घोटाले सुर्खियों में आते हैं, एक -दो कर्मचारियों को निलंबित कर जांच बैठा दी जाती है। कुछ दिनों बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। नगर निगम में हुए जीपीएफ घोटाले को लेकर भी यह आशंका जताई जा रही है। जानकारों का मानना है कि जीपीएफ का काम देख रहे बाबू अभिलाष श्रीवास्तव को निलंबित कर उनसे राशि तो वसूल ली गई लेकिन न तो उन पर अभी तक एफआईआर दर्ज कराई गई और न ही इसकी जांच कराई गई कि क्या इस पूरे घोटाले को सिर्फ अभिलाष श्रीवास्तव ने अंजाम दिया। कहीं बाबू की बली चढ़ाकर (निलंबित कर) घोटाले में शामिल बड़े घोटालेबाजों को बचाने का प्रयास तो नहीं हो रहा।
बाबू ऐसे करता था खेल
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