क्या नए श्रम कानून भारतीय मजदूरों को सशक्त बना रहे हैं या असुरक्षित? पढ़ें 1 मई मजदूर दिवस पर विशेष विश्लेषण—मजदूरी, गिग इकोनॉमी और श्रमिकों के अधिकारों की जमीनी हकीकत।

फीचर डेस्क। स्टार समाचार वेब
हर साल जब 1 मई की सुबह आती है, तो यह केवल एक छुट्टी या रस्म अदायगी का दिन नहीं, बल्कि शिकागो की उन गलियों की याद दिलाती है जहाँ '8 घंटे काम' के अधिकार के लिए खून बहाया गया था। विडंबना देखिए कि आज भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में, जहाँ हम 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं, वहीं हमारे श्रम सुधारों की दिशा मजदूरों को संरक्षण देने के बजाय उन्हें एक अनिश्चित भविष्य की ओर धकेलती दिख रही है। सरकार ने 29 पुराने कानूनों को समेटकर चार नए लेबर कोड तो बना दिए, लेकिन सरलीकरण की इस प्रक्रिया में जो 'सुरक्षा जाल' था, वह कहीं गुम हो गया है।
आज का सबसे बड़ा संकट 'फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट' के रूप में उभरा है। कॉरपोरेट जगत के लिए यह लचीलापन हो सकता है, लेकिन एक मजदूर के लिए यह आजीवन 'अस्थायी' रहने का अभिशाप है। जब नौकरी की गारंटी ही खत्म हो जाए, तो पेंशन और ग्रेच्युटी जैसे शब्द महज कागजी सजावट बनकर रह जाते हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक वह कानूनी जाल है जो काम के घंटों को फिर से 12 घंटे की ओर खींच रहा है। जिस 8 घंटे की शिफ्ट के लिए सदियों संघर्ष हुआ, उसे 'फ्लेक्सिबिलिटी' के नाम पर दांव पर लगाना श्रमिकों के स्वास्थ्य और उनके सामाजिक अस्तित्व पर सीधा हमला है।
भारत की आर्थिक रीढ़ कहे जाने वाले असंगठित क्षेत्र की स्थिति और भी विकट है। विशेषकर नई उभरती 'गिग इकोनॉमी' में काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर्स और ड्राइवरों को शब्दावली के हेरफेर में फंसा दिया गया है। उन्हें 'पार्टनर' कहकर कंपनियों ने खुद को नियोक्ता की जिम्मेदारियों से मुक्त कर लिया है, जिससे लाखों युवा बिना किसी सामाजिक सुरक्षा या बीमा के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। महंगाई का ग्राफ जिस तेजी से ऊपर जा रहा है, उसके सामने न्यूनतम मजदूरी की सुस्त रफ्तार किसी मजाक से कम नहीं लगती। दाल और तेल की कीमतों के बीच 300-400 रुपये की दिहाड़ी पर परिवार पालना किसी प्रबंधन कौशल का नहीं, बल्कि मजदूर की सहनशीलता का प्रमाण है।
लोकतंत्र में विरोध की आवाज को ट्रेड यूनियनों के माध्यम से सुना जाता था, लेकिन नए औद्योगिक संबंध कोड ने उनके हाथ-पैर बांध दिए हैं। हड़ताल की शर्तों को जटिल बनाकर सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति को कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। अंततः, हमें यह समझना होगा कि गगनचुंबी इमारतों और स्मार्ट शहरों की चमक उन हाथों के बिना फीकी है जो इनकी नींव रखते हैं। मजदूर दिवस उत्सव मनाने से ज्यादा उन कानूनों पर आत्मचिंतन करने का दिन है, जो विकास के नाम पर इंसान को केवल एक 'रिसोर्स' (संसाधन) समझकर उसके अधिकारों की बलि चढ़ा रहे हैं। सुरक्षित श्रमिक के बिना समृद्ध भारत का सपना अधूरा है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का सार्वजनिक जीवन ऐसी ही असाधारण यात्रा का उदाहरण है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में लगभग 13 वर्षों तक उन्होंने शासन की एक ऐसी शैली विकसित की, जिसमें विकास, सुशासन और जनभागीदारी को केंद्र में रखा गया।
मोदी जी की कूटनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है, जिसने पूर्व में जी-20 के मंच पर भी विश्व को चकित किया था। लगभग सात वर्ष बाद चीनी और रूस जैसे देशों को एक साथ एक मंच पर लाना निःसंदेह उनकी उसी भगीरथ भूमिका की पुष्टि करता है, जिसके बल पर वे उभरती बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में भारत को केंद्रीय स्थान दिला चुके हैं।
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