भारत की प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से घटकर 1.9 रह गई है। एलन मस्क ने भी इस पर चिंता जताई है। जानिए भारत में गिरती जन्म दर के कारण और इसके भविष्य पर होने वाले असर के बारे में।

भारत, जो कभी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वाला देश माना जाता था, आज जनसांख्यिकीय (demographic) बदलाव के एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। हालिया रिपोर्ट्स ने नीति-निर्माताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चौंका दिया है। आंकड़े बताते हैं कि भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate - TFR) अब 'रिप्लेसमेंट लेवल' से नीचे गिर चुकी है।
इस बदलाव ने न केवल देश के भीतर चिंता पैदा की है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी ध्यान खींचा है। टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने भी भारत की गिरती जन्म दर पर चिंता जताते हुए कहा है कि इसका दीर्घकालिक रूप से देश की जनसंख्या संरचना पर गहरा असर पड़ सकता है।
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 पर आ गई है।
क्या होता है रिप्लेसमेंट लेवल? जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए रिप्लेसमेंट लेवल फर्टिलिटी रेट 2.1 होना जरूरी माना जाता है। इसका मतलब है कि औसतन प्रति महिला 2.1 बच्चों का जन्म होना चाहिए, ताकि बिना किसी माइग्रेशन (प्रवासन) के एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी की जगह ले सके। 1.9 का आंकड़ा यह दर्शाता है कि अब भारत में आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी संख्या से कम बच्चे पैदा हो रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, गिरती प्रजनन दर के पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि तेजी से बदलते सामाजिक और आर्थिक कारक जिम्मेदार हैं:
तेजी से होता शहरीकरण और जीवनशैली: गांवों के मुकाबले शहरों में रहने का खर्च बहुत अधिक है। सीमित संसाधनों और जगह की कमी के कारण शहरी कामकाजी जोड़े अब 'एक या दो बच्चे' की नीति को खुद ही अपना रहे हैं।
महिलाओं की शिक्षा और करियर को प्राथमिकता: महिलाओं में उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी हुई है। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की चाह में महिलाएं अब करियर को प्राथमिकता दे रही हैं, जिससे शादी और बच्चे पैदा करने की उम्र में बदलाव आया है।
बढ़ती महंगाई और परवरिश का खर्च: बच्चों की अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पालन-पोषण की लागत पिछले कुछ वर्षों में आसमान छू चुकी है। मध्यमवर्गीय परिवार अब संख्या के बजाय बच्चों की 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' पर ध्यान दे रहे हैं।
देर से शादी करने का चलन: करियर बनाने और वित्तीय स्थिरता हासिल करने की होड़ में युवा अब देर से शादियां कर रहे हैं। उम्र बढ़ने का सीधा असर जैविक रूप से प्रजनन क्षमता पर पड़ता है।
परिवार नियोजन और गर्भनिरोधकों तक आसान पहुंच: सरकारी जागरूकता अभियानों और स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण से लोग अब अनचाहे गर्भधारण से बच रहे हैं और सोच-समझकर फैमिली प्लानिंग कर रहे हैं।
कम फर्टिलिटी रेट के तात्कालिक फायदे (जैसे संसाधनों पर कम दबाव) हो सकते हैं, लेकिन भविष्य के लिए यह एक गंभीर अलार्म है:
जब जन्म दर कम होगी, तो युवाओं की तुलना में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ेगी। इससे देश के सोशल सिक्योरिटी सिस्टम, पेंशन फंड और हेल्थकेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव पड़ेगा।
भारत को वर्तमान में अपनी 'युवा आबादी' (Demographic Dividend) के लिए जाना जाता है। लेकिन आने वाले दशकों में युवाओं की कमी के कारण लेबर मार्केट प्रभावित हो सकता है, जिससे देश की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) धीमी पड़ सकती है।

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