सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के आतंक पर ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों और बुजुर्गों की मौतों पर राज्य सरकारों पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। कोर्ट ने डॉग लवर्स की जवाबदेही तय करने के संकेत दिए।
By: Ajay Tiwari
Jan 13, 20261:08 PM
सुप्रीम कोर्ट की दोटूक- 'इंसान नहीं रह सकते तो जानवर भी नहीं, अब राज्य सरकारें भरेंगी कुत्तों के हमलों का हर्जाना'
नई दिल्ली:
आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और उनसे होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बेहद तल्ख रुख अख्तियार किया। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब कुत्तों के हमलों के लिए न केवल जिम्मेदार अधिकारियों बल्कि उन्हें खाना खिलाने वालों की जवाबदेही भी तय की जाएगी। कोर्ट ने चेतावनी दी कि बच्चों या बुजुर्गों के घायल होने या मौत होने की स्थिति में राज्य सरकारों के खिलाफ भारी मुआवजे का आदेश दिया जाएगा।
कोर्ट रूम में चर्चा के दौरान जस्टिस मेहता ने गुजरात हाईकोर्ट की एक घटना का जिक्र करते हुए चिंता जताई। उन्होंने कहा कि स्थिति इतनी भयावह है कि अदालतों में भी कुत्तों के हमले हो रहे हैं। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जब नगर निगम के कर्मचारी कुत्तों को पकड़ने जाते हैं, तो तथाकथित 'कुत्ता प्रेमी' और वकील उन पर हमला कर देते हैं। बेंच ने सवाल किया कि जब 9 साल के मासूम पर हमला होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या वह संगठन लेगा जो उन्हें सड़क पर खाना खिला रहा है?
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों को कड़ा संदेश देते हुए कहा, "जो लोग दावा करते हैं कि वे कुत्तों के हितैषी हैं, उन्हें इन जानवरों को अपने घर ले जाना चाहिए।" कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों जैसे अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस डिपो और शैक्षणिक संस्थानों को कुत्तों की शरणस्थली नहीं बनाया जा सकता। सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार की दलीलों पर सहमति जताते हुए कोर्ट ने संकेत दिए कि जहाँ इंसान स्थायी रूप से नहीं रह सकते, वहां जानवरों की मौजूदगी को भी अनिवार्य नहीं माना जा सकता।
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सुनवाई के दौरान एडवोकेट दातार ने एक चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा। उन्होंने बताया कि लद्दाख में लगभग 55,000 आवारा कुत्ते खुले घूम रहे हैं, जिनकी वजह से 9 वन्यजीव प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं। यहाँ तक कि रणथंभौर नेशनल पार्क में बाघों के एक लाइलाज बीमारी से संक्रमित होने का कारण भी ये कुत्ते ही बने हैं। कोर्ट ने माना कि यह समस्या अब केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र के लिए भी बड़ा खतरा बन गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह 7 नवंबर के अपने उस आदेश का दायरा बढ़ा सकता है, जिसमें सार्वजनिक परिसरों को कुत्ता मुक्त रखने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि सरकार की निष्क्रियता अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। आने वाले समय में कोर्ट एक ऐसा तंत्र विकसित कर सकता है जहाँ आवारा कुत्तों के शिकार हुए लोगों को राज्य के खजाने से बड़ी राहत राशि दिलाई जाए, ताकि प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर हो सके।