अमित सेंगर के कॉलम थर्ड डिग्री में आज पढ़ें-कैसे दफ्तर से गायब होकर घर में आराम फरमा रही मोहर्तमा की पोल खुली, हाइवे थाने के दाग फिर उभरे, साहब की खुशहाली ने सबको चौंकाया और नए साहब की ट्वेंटी-ट्वेंटी पारी बनी चर्चा का विषय। सत्ता, सिस्टम और साहब के अंदाज़ की रोचक दास्तान।

हाइलाइट्स
काम न आई चालबाजी
काम-काज का मूल्यांकन ऑनलाइन राजधानी से मैडम कर रही थी, जिलेवार काम कैसा हो रहा इसकी जानकारी संबंधितों से लिया जा रहा था,तभी उन्होंने सबसे अपने-अपने दफ्तर के बारे में सवाल कर डाला, आदेश दिया अपना दफ्तर दिखाओ जरा हम भी देंखे क्या -क्या व्यवस्था है,एक-एक कर सबने अपने दफ्तर की तस्वीर दिखानी शुरू कर दी। बारी आई एक मैडम की। इन मोहर्तमा ने तपाक से जबाब दिया उनका दफ्तर सबसे हाईटेक है,जवाब सुन राजधानी में बैठी मैडम ने कहा जरा दिखाओ तो अपना दफ्तर, इन मैडम के सवाल से मोहर्तमा फंस गई,अब भला दफ्तर दिखाए तो दिखाएं कैसे, जब दफ्तर में हों तब न। दरअसल मोहर्तमा दफ्तर की बजाए घर में आराम फरमा रही थी, आखिरकार इनकी पोल खुल गई। हकीकत जान राजधानी वाली मैडम का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया, झूठ पकड़ जाने पर कहा इसे निलबिंत करो, निलंबन की बात पर मोहर्तमा घबरा गई, मदद मांगी पतिदेव से। अर्धागिंनी के बचाव के लिए उन्होंने सीधे मैडम को फोन घुमा दिया, फोन सुनते ही मैडम का गुस्सा फूट पड़ा, मैडम साथ बैठे सहयोगियों से बोली इसकी बात रिकॉर्ड में लो। मैडम के कड़क अंदाज ने मोहर्तमा की बोलती बंद कर दी। यह मोहर्तमा रेखाओं के मिलान वाली शाखा में तैनात हैं और सोनांचल से तल्लाकु रखती हैं।
दाग हैं कि मिटते ही नहीं
हाइवे के थाने का दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ रहा, एक मामला किसी तरह शांत हुआ, लोग उस घटना को भूल गए, हालांकि इसकी आंच प्रभारी तक पहुंची उन्हें रुखसत होना पड़ा था। समय बीता सब कुछ सही चल रहा था,अचानक एक दिन रिश्वत का खेल उजागर हो गया, जो दाग मिटा था वह फिर से लग गया,यह ऐसा दाग जो जल्द छूटने वाला नहीं। इसकी गूंज राजधानी तक पहुंची है, इस गूंज का दुष्प्रभाव असर आने वाले दिनों में दिख सकता है। खोज शुरू हो गई है इस खेल में खिलाड़ी स्वतंत्र होकर खेल रहे थे या नियंत्रण किसी और का था। वैसे गलियारे में चर्चा है आय के यह खेल बिना सरपरस्ती के संभव नहीं। अगर ऐसा नहीं तो फिर मातहतों पर उनका नियंत्रण नहीं। ऐसे में इनके रहते दाग लगने के अवसर पैदा होते ही रहेंगे।
इस बार सब खुश
यूं तो साहब से शाबासी कम ही मिलती है, इसका एहसास साहब के सभी मातहतों को है,लेकिन काम का मूल्यांकन कर अपने मातहतों को सही स्थान साहब देते रहे हैं, यह जरूर की साहब दिखावे की परम्परा से दूर हैं। इस कारण उनके कार्य प्रचारित नहीं होते। इस बार साहब कुछ ज्यादा ही खुश नजर आए, इसकी बानगी देखने को मिली, कई नामों को मंच से नवाजा गया, कुछ को आॅफिस में। हर बार ज्यादा लोग अपना-अपना दु:ख जाहिर करते नजर आते थे, कहते सुने गए थे क्या हम इस काबिल भी नहीं। इस बार साहब ने ऐसा खुश किया कि इसका अंदाजा मातहतों को भी नहीं था। साहब के इस बदले रुख की चर्चा खाकी के बीच खूब हो रही, सब साहब के इस अंदाज की वजह जानने अपने-अपने तरीके से पता करने में लगे हंै आखिर अबकी बार इतनी खुशहाली कैसे बढ गई?
साहब की पारी
एक जिले के साहब प्रशिक्षण में गए हैं, जिले का काम कामकाज देखने के लिए एक साहब को भेजा गया है ताकि खाकी का असर बरकरार रहे,क्योंकि इस जिले में खाकी का इकबाल बड़ी मुश्किल से बुलंद हो रहा। नए-नवेले साहब ने पहले यहां की तासीर को समझा,क्या कुछ की संभावना है इसकी तलाश की। वक्त कम है काम जल्द निपटाना है सो साहब अपनों से जल्द मुलाकात कर उनकी समस्या का निराकरण करने में जुट गए। साहब की ट्वेंटी-ट्वेंटी स्टाइल की पारी देख गलियारे में चर्चाओं का दौर जारी है। साहब आदेश निकालने के फिराक में भी बताए जा रहे हैं कुछ को आश्वासन भी दे दिया जल्द भला करते है। भला करने के खेल में खादी की बाधा को दूर कर पाना साहब के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही। यह साहब जोन के एक जिले में प्रमोट होने के पहले सेवाएं दे चुके हैं, तब भी ये चर्चा में बने रहते थे।


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