बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में महाकाल मंदिर से रामघाट को जोड़ने वाला 14वीं सदी का ऐतिहासिक क्षिप्रा द्वार अचानक ढह गया। हाल ही में इस पर 2.12 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे।

उज्जैन। स्टार समाचार वेब
बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन से एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। महाकाल मंदिर को रामघाट से जोड़ने वाला करीब 14वीं सदी का ऐतिहासिक महाकाल द्वार (जिसे क्षिप्रा द्वार भी कहा जाता है) शनिवार-रविवार की दरमियानी रात अचानक ढहकर मलबे में तब्दील हो गया। गनीमत यह रही कि यह हादसा देर रात के समय हुआ, जिससे आसपास कोई मौजूद नहीं था और एक बड़ा हादसा तथा जनहानि टल गई। इस घटना के सामने आने के बाद उज्जैन स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, निर्माण एजेंसी और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
खास बात यह है कि इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और जीर्णोद्धार पर हाल ही में उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड द्वारा लगभग 2.12 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इसके बावजूद इतनी मजबूत और प्राचीन संरचना का अचानक ढह जाना निर्माण कार्य की गुणवत्ता और प्रशासनिक निगरानी की पोल खोलता है। करीब तीन साल पहले ही इस धरोहर को संवारा गया था, लेकिन इस तरह इसके मलबे में तब्दील होने से स्थानीय लोगों और शहरवासियों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, महाकाल द्वार के समीप सम्राट विक्रमादित्य हेरिटेज होटल के पास 77 मीटर लंबे मार्ग का निर्माण कार्य चल रहा था। आरोप है कि निर्माण के दौरान भारी मशीनों और जेसीबी से द्वार के बहुत नजदीक गहरी खुदाई की गई थी। इस ऐतिहासिक संरचना को सहारा देने के लिए किसी भी तरह के पर्याप्त सुरक्षात्मक इंतजाम नहीं किए गए थे। न तो मिट्टी खिसकने से रोकने के लिए रिटेनिंग वॉल बनाई गई और न ही द्वार को कोई आवश्यक सपोर्ट दिया गया। इसके अलावा, पिछले दो-तीन दिनों से हो रही लगातार बारिश के कारण मिट्टी में नमी बढ़ने और जमीन धंसने की स्थिति ने इस हादसे को और बढ़ावा दिया। कार्यपालन यंत्री कमल सक्सेना ने बताया कि डीप एक्सकेवेशन और बारिश के चलते जमीन धंसने की आशंका है, हालांकि वास्तविक वजह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
यह क्षिप्रा द्वार केवल पत्थरों की कोई साधारण संरचना नहीं थी, बल्कि यह उज्जैन की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा था। बेसाल्ट पत्थरों और प्राचीन ईंटों से बने इस 14वीं शताब्दी के द्वार का गहरा धार्मिक महत्व है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धालु क्षिप्रा नदी के रामघाट पर स्नान करने के बाद इसी क्षिप्रा द्वार से होकर भगवान महाकालेश्वर के दर्शन करने के लिए जाते थे। सिंधिया काल और वर्ष 2004 के सिंहस्थ के दौरान भी इसका पुनरुद्धार किया गया था। हालिया जीर्णोद्धार के दौरान इसमें चूना, गुड़, मेथी, गूगुल, उड़द का पानी और बेलपत्र के रस जैसी पारंपरिक और प्राचीन सामग्रियों के इस्तेमाल का दावा किया गया था।
रविवार सुबह जब स्थानीय लोगों ने सदियों पुरानी इस ऐतिहासिक धरोहर को जमींदोज देखा, तो उनमें प्रशासनिक लापरवाही को लेकर जबरदस्त नाराजगी फैल गई। घटना की सूचना मिलते ही स्मार्ट सिटी के वरिष्ठ अधिकारी तुरंत मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लेकर मामले की गहन जांच शुरू कर दी है। फिलहाल, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग जोर पकड़ रही है।
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