संयुक्त राष्ट्र (UN) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रोकना अब असंभव हो गया है। जानिए जलवायु परिवर्तन के इस नए और खतरनाक दौर के बारे में पूरी जानकारी।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक नई और बेहद डरावनी रिपोर्ट ने उस कड़वे सच पर मुहर लगा दी है, जिसे दुनिया पिछले कुछ सालों से अपने आसपास साफ महसूस कर रही थी। अब पृथ्वी के बढ़ते तापमान को पेरिस समझौते के तहत तय की गई 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर हमेशा के लिए रोक पाना नामुमकिन हो गया है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की इस रिपोर्ट के आने के बाद, अब ग्लोबल वार्मिंग से जुड़ी बहस का दायरा पूरी तरह बदल चुका है। आइए जानते हैं कि इस रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और भविष्य के लिए इसके क्या मायने हैं।
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अब विज्ञान के पास ऐसा कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं बचा है जो तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रख सके।
तापमान में और बढ़ोतरी तय: सबसे अनुकूल परिस्थितियों में भी, तापमान में गिरावट शुरू होने से पहले यह कम से कम 1.8 डिग्री सेल्सियस तक जरूर पहुंचेगा। वहीं, अन्य अधिकांश अनुमान यह चेतावनी देते हैं कि यह 2 डिग्री सेल्सियस की खतरनाक सीमा को भी पार कर जाएगा।
कार्बन बजट की समाप्ति: यदि दुनिया इसी रफ्तार से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रखती है, तो 1.5 डिग्री की सीमा के लिए बचा हुआ 'कार्बन बजट' अगले 3 सालों में पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
महत्वपूर्ण तथ्य: साल 2015 के ऐतिहासिक पेरिस समझौते का मुख्य उद्देश्य तापमान वृद्धि को 2 डिग्री से काफी नीचे और हर हाल में 1.5 डिग्री के भीतर रखना था। लेकिन साल 2024 इतिहास का सबसे गर्म साल दर्ज किया गया, जिसमें औसत तापमान पुरानी सीमा से 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि 1.5 डिग्री का आंकड़ा पूर्व-औद्योगिक स्तर पर तय की गई एक मानक सीमा रेखा है। इस सीमा को पार करते ही रातों-रात कोई जादुई तबाही नहीं आ जाएगी, लेकिन इसके परिणाम पहले से कहीं अधिक आक्रामक होंगे।
आज हम जो भीषण गर्मी, भयानक सूखा, बेमौसम बारिश और विनाशकारी बाढ़ जैसी आपदाएं देख रहे हैं, वे तापमान बढ़ने के साथ और अधिक तीव्र और बार-बार होने लगेंगी।
नेपाल में हाल ही में ग्लेशियर टूटने से आई भयानक बाढ़ का उदाहरण देते हुए भारतीय ऊर्जा विशेषज्ञों ने इसे एक गंभीर चेतावनी बताया है। उन्होंने कहा कि इन आपदाओं की भारी कीमत इंसानी जान और उजड़ते परिवारों के रूप में चुकानी पड़ रही है।
UNEP की रिपोर्ट का मुख्य फोकस अब इस बात पर है कि क्या इंसान ऐसे आपातकालीन कदम उठा सकता है जिससे 1.5 डिग्री की सीमा लांघने के बाद होने वाले नुकसान को सीमित किया जा सके और भविष्य में तापमान को फिर से नीचे लाया जा सके?
हवा से कार्बन सोखने की तकनीक (CDR): तापमान को वापस नीचे लाने का दारोमदार मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड रिमूवल (CDR) तकनीकों पर टिका होगा।
सीमित प्रभाव: हालांकि हवा से कार्बन घटाना जरूरी है, लेकिन वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि ये तकनीकें अभी उस स्तर पर कारगर नहीं हैं। इन्हें जहरीली गैसों का उत्सर्जन रोकने का विकल्प बिल्कुल नहीं माना जा सकता।
भले ही पेरिस समझौते के बाद उठाए गए कदमों से स्थिति थोड़ी संभली हो—जिसके चलते तापमान में संभावित 4 डिग्री की बढ़ोतरी अब 2.8 डिग्री के आसपास रुकती दिख रही है—लेकिन यह नाकाफी है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नीतियों से काम नहीं चलेगा। गर्म होती धरती पर सबसे ज्यादा खतरे की जद में जी रहे गरीब और विकासशील देशों के नागरिकों को बचाने के लिए पूरी दुनिया को तुरंत एकजुट होकर वित्तीय और व्यावहारिक मदद मुहैया करानी होगी।

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