देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी से 8 लोगों की मौत ने नगर निगम के दावों की पोल खोल दी है। जानिए कैसे अफसरों की लापरवाही ने अमृत को जहर बना दिया।

इंदौर। अजय तिवारी
देश का सबसे स्वच्छ शहर, 'मिनी मुंबई', और न जाने कितने ही अलंकारों से सजा इंदौर आज एक शर्मनाक सवाल के घेरे में खड़ा है। सवाल यह कि जिस शहर की आबोहवा को सात बार स्वच्छता का सिरमौर बनाया गया, वहां की पाइपलाइनों में 'जहर' कैसे घुल गया? भागीरथपुरा में हुई 8 मौतें महज एक हादसा नहीं, बल्कि नगर निगम के सिस्टम द्वारा की गई 'संस्थागत हत्या' है।
हैरानी की बात यह है कि इस त्रासदी की इबारत महीनों पहले लिखी जा चुकी थी। भागीरथपुरा की पाइप लाइनें 30 साल पुरानी और जर्जर हो चुकी थीं। शिकायतें दफ्तरों के चक्कर लगा रही थीं, लेकिन हुक्मरानों की नींद तब टूटी जब घरों से अर्थियां उठने लगीं। महापौर परिषद ने अगस्त में ही लाइन बदलने की मंजूरी दे दी थी, लेकिन फाइलों के बोझ तले दबे 'अपर आयुक्त' स्तर के अधिकारियों ने इसे आगे बढ़ाना जरूरी नहीं समझा। क्या इंदौर के अफसरों को काम शुरू करने के लिए लाशों की गिनती का इंतजार रहता है?
इंजीनियरिंग का 'अजूबा': पाइपलाइन पर शौचालय!
इंदौर की शहरी प्लानिंग किसी भद्दे मजाक से कम नहीं है। भागीरथपुरा की घनी बसाहट में नर्मदा की पेयजल लाइन और ड्रेनेज लाइन कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं। हद तो तब हो गई जब नर्मदा लाइन के ठीक ऊपर शौचालय बना दिया गया। जब ड्रेनेज चोक हुआ, तो वैक्यूम के चलते शौचालय की गंदगी सीधे शहर की प्यास बुझाने वाली नलों में समा गई। यह तकनीकी चूक नहीं, बल्कि घोर प्रशासनिक अंधापन है।
दोषियों पर 'दिखावे' का हंटर
हर बार की तरह, इस बार भी बलि का बकरा छोटे कर्मचारियों को बनाया गया। जोनल अधिकारी और उपयंत्री को निलंबित कर सरकार ने अपनी पीठ थपथपा ली, लेकिन उन 'बड़े साहबों' का क्या जिनकी मेज पर फाइलें महीनों तक धूल फांकती रहीं? दूरसंचार कंपनियों ने टेलीफोन लाइन के लिए जमीन खोदकर पाइपलाइनें छलनी कर दीं, लेकिन किसी ने ऑडिट करने की जहमत नहीं उठाई।
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आंकड़ों की बाजीगरी बनाम हकीकत
स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम अब भी 'डैमेज कंट्रोल' में जुटे हैं। 8 मौतें हो चुकी हैं, लेकिन विभाग आधिकारिक पुष्टि केवल 3 की कर रहा है। 111 मरीज अब भी अस्पतालों में जीवन-मौत की जंग लड़ रहे हैं। हकीकत यह है कि भागीरथपुरा तो सिर्फ एक उदाहरण है, इंदौर की कई पुरानी बस्तियों में ऐसी ही जर्जर लाइनें किसी बड़े धमाके का इंतजार कर रही हैं।
पदक से प्यास नहीं बुझती
इंदौर को यह समझना होगा कि स्वच्छता केवल सड़कों पर झाड़ू लगाने और दीवारों पर पेंटिंग करने से नहीं आती। असली स्वच्छता वह है जो एक नागरिक को सुरक्षित पेयजल की गारंटी दे सके। अगर देश का सबसे स्वच्छ शहर अपने नागरिकों को 'मल मिश्रित पानी' पिला रहा है, तो समझ लीजिए कि स्वच्छता का यह 'स्वर्ण पदक' अंदर से पूरी तरह खोखला हो चुका है।

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