एक ही देश, लगभग समान तकनीक, कोयला आधारित उत्पादन और निर्माण एजेंसी के रूप में वही बीएचईएल, इसके बावजूद थर्मल पावर प्लांट की लागत में 5 से 6 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट तक का अंतर सामने आ रहा है

स्टार एसटीएफ । भोपाल
देश में बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नए थर्मल पावर प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं। सरकारें इन्हें ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास की रीढ़ बता रही हैं, लेकिन इन परियोजनाओं की प्रति मेगावाट लागत ने अब गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि एक ही देश, लगभग समान तकनीक, कोयला आधारित उत्पादन और निर्माण एजेंसी के रूप में वही बीएचईएल, इसके बावजूद थर्मल पावर प्लांट की लागत में 5 से 6 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट तक का अंतर सामने आ रहा है। छत्तीसगढ़ में सरकारी कंपनी जहां करीब 11.9 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की लागत में सुपरक्रिटिकल थर्मल प्लांट खड़ा कर रही है, वहीं मध्य प्रदेश की सरकारी कंपनी उसी तकनीक के बावजूद 17.5 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट खर्च कर रही है। इससे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह अंतर केवल तकनीकी कारणों से है या फिर परदे के पीछे कुछ और ही सच्चाई है ।
छत्तीसगढ़ का हसदेव प्लांट, कम लागत, मजबूत उदाहरण
छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (सीजीपीजेसीएल) द्वारा कोरबा पश्चिम स्थित हसदेव थर्मल पावर स्टेशन में 1320 मेगावाट (660-660 मेगांवाट की दो इकाइयां )की सुपरक्रिटिकल इकाइयों की स्थापना की जा रही है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 11,800 से 15,800 करोड़ रुपये बताई गई है। न्यूनतम आकलन के आधार पर इसकी प्रति मेगावाट लागत लगभग 11.9 करोड़ रुपये बैठती है। बीएचईएल द्वारा निर्मित यह प्लांट आधुनिक तकनीक, कम कोयला खपत और बेहतर पर्यावरणीय मानकों के साथ तैयार किया जा रहा है, जिसे ऊर्जा विशेषज्ञ किफायती और व्यावहारिक मॉडल मानते हैं
निजी कंपनी, फिर भी सरकारी से सस्ती बिजली
मध्य प्रदेश विद्युत प्रबंधन कंपनी लिमिटेड (एमपीईएमसीएल) ने अनूपपुर जिले में 1600 मेगावाट का अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्रोजेक्ट अडाणी पावर लिमिटेड को दिया है। इस परियोजना में लगभग 21,000 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। इसके अनुसार प्रति मेगावाट लागत 13.12 करोड़ रुपये बैठती है। यानी निजी कंपनी मुनाफा जोड़ने के बावजूद उस सरकारी कंपनी से सस्ती बिजली बना रही है, जो जनता के पैसे से संचालित हो रही है।
एमपीपीजीएसएल के सरकारी प्लांट सबसे महंगे क्यों?
मध्य प्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी लिमिटेड द्वारा अमरकंटक ताप विद्युत गृह, चचाई में 660 मेगावाट तथा सतपुड़ा ताप विद्युत गृह, सारनी में 660 मेगावाट (कुल 1320 मेगावाट) का संयत्र बना रही है। इन दोनों अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल इकाइयों पर कुल 23,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं। अमरकंटक यूनिट की लागत 11,476.31 करोड़ और सारनी यूनिट की लागत 11,678.74 करोड़ रुपये है। इस तरह इन परियोजनाओं की प्रति मेगावाट लागत 17.54 करोड़ रुपये बैठती है, जो छत्तीसगढ़ से करीब 5.6 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट अधिक है।
एक ही तकनीक, एक ही एजेंसी फिर अंतर क्यों?
दोनो राज्यों की परियोजनाएं कोयला आधारित हैं, सुपर या अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल तकनीक पर आधारित हैं और निर्माण एजेंसी के रूप में बीएचईएल ही है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि इतना बड़ा लागत अंतर केवल डिजाइन या क्षमता उपयोग से नहीं समझाया जा सकता। विशेषज्ञों के अनुसार अधिक लागत का सीधा असर फिक्स्ड चार्ज, बैंक ब्याज और अंतत: बिजली दरों पर पड़ता है। चूंकि एमपीपीजीसीएल की लगभग 80 प्रतिशत पूंजी बैंक ऋण से जुटाई जा रही है, इसलिए इसका बोझ सीधे उपभोक्ताओं के बिजली बिल पर आएगा।
क्या निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाया जा रहा है?
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकार मानते हैं कि यदि सरकारी थर्मल प्लांट महंगे होंगे, तो उनकी बिजली दरें स्वाभाविक रूप से ऊंची होंगी। इसके बाद सरकार यह तर्क दे सकेगी कि जनता को राहत देने के लिए निजी कंपनियों से बिजली खरीदना जरूरी है। यानी पहले सरकारी उत्पादन को महंगा बनाना और फिर निजी कंपनियों को सस्ता विकल्प बताकर आगे लाना, यह रणनीति नीतिगत मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

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इबोला वायरस अफ्रीकी देशों में तेजी से फैल रहा है। इसके दुर्लभ बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का मौजूदा प्रकोप गंभीर है। डीआर कांगो में हजारों पुष्ट मामले और मौतें दर्ज हुई हैं, वहीं नाइजीरिया, युगांडा और केन्या में सामने आए मामलों ने सीमा पार प्रसार की चिंता बढ़ाई है। फिलहाल इसकी वैक्सीन नहीं होना भी एक बड़ी चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातस्थिति घोषित किया है।
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मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
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किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
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