सूचना का अधिकार कानून लागू होने के 21 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन देश में पारदर्शिता और न्याय की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। पारदर्शिता पर काम करने वाले संगठन सतर्क नागरिक संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून 2026 तक देश के 28 सूचना आयोगों में 3,85,000 से अधिक अपीलें और शिकायतें लंबित हैं।

2026 के बीच लंबित मामलों की संख्या में 9,378 की वृद्धि दर्ज की गई
केस के निपटारे में कम से कम एक साल या उससे अधिक का समय
नई दिल्ली/भोपाल। स्टार समाचार वेब
सूचना का अधिकार कानून लागू होने के 21 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन देश में पारदर्शिता और न्याय की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। पारदर्शिता पर काम करने वाले संगठन सतर्क नागरिक संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून 2026 तक देश के 28 सूचना आयोगों में 3,85,000 से अधिक अपीलें और शिकायतें लंबित हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2026 तक पूरे देश के सूचना आयोगों में कुल 3,85,000 से ज्यादा केस लंबित हैं। पारदर्शिता कार्यकर्ता कमोडोर लोकेश बत्रा (सेवानिवृत्त) के अनुसार, केवल सीआईसी में ही 1 जनवरी से 12 अक्टूबर 2026 के बीच लंबित मामलों की संख्या में 9,378 की वृद्धि दर्ज की गई है।
न्याय मिलने में अत्यधिक देरी
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश के 14 सूचना आयोगों में केस के निपटारे में कम से कम एक साल या उससे अधिक का समय लग रहा है। त्रिपुरा में मामलों के निपटारे की अनुमानित प्रतीक्षा अवधि 19 साल 8 महीने है। मध्य प्रदेश में यह अवधि लगभग 19 साल 2 महीने और छत्तीसगढ़ में लगभग 18 साल आंकी गई है।
बिना आदेश लौटाए हजारों मामले
रिपोर्ट में इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई गई है कि बिना कोई आधिकारिक आदेश पारित किए मामलों को वापस लौटाया जा रहा है। जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच 9 सूचना आयोगों ने बिना आदेश पारित किए कुल 37,701 केसों को वापस लौटा दिया। इनमें सीआईसी के 14,603, महाराष्ट्र के 14,140, बिहार के 4,417 और गुजरात के 3,276 मामले शामिल हैं। पांच आयोगों ने लौटाई गई अपीलों और शिकायतों का आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया।
इनका कहना है
तय प्रारूपों का पूरी तरह पालन न करने और पृष्ठ संख्या जैसी मामूली कमियों के आधार पर भी नागरिकों की अपीलें वापस लौटाई जा रही हैं। आयोगों का मुख्य उद्देश्य जनता को सूचना पाने में सहायता करना होना चाहिए, न कि उनके रास्ते में प्रशासनिक बाधाएं खड़ी करना।
अंजलि भारद्वाज, संस्थापक, एसएनएस
समाज के गरीब और वंचित वर्ग के कई आवेदक बिना किसी कानूनी मदद के अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। इसलिए, यदि बुनियादी जानकारी उपलब्ध है, तो तकनीकी कमियों के बजाय अपीलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जानी चाहिए।
अमृता जोहरी, एसएनएस से जुड़ी कार्यकर्ता

सूचना का अधिकार कानून लागू होने के 21 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन देश में पारदर्शिता और न्याय की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। पारदर्शिता पर काम करने वाले संगठन सतर्क नागरिक संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून 2026 तक देश के 28 सूचना आयोगों में 3,85,000 से अधिक अपीलें और शिकायतें लंबित हैं।
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