सुप्रीम कोर्ट के मुख्य नयायाधीश बीआर गवई पर जूता फेंकने की कोशिश के मामले पर अदालत ने उस वकील के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई से इंकार कर दिया है। इससे पहले सीजेआई ने खुद उसके खिलाफ कार्रवाई करने से मना कर दिया था।

मुख्य नयायाधीश पर जूता फेंकने की कोशिश के मामले पर अदालत ने वकील के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई से इंकार कर दिया है।
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य नयायाधीश बीआर गवई पर जूता फेंकने की कोशिश के मामले पर अदालत ने उस वकील के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई से इंकार कर दिया है। इससे पहले सीजेआई ने खुद उसके खिलाफ कार्रवाई करने से मना कर दिया था। कोर्ट ने कहा की अदालत में नारे लगाना, जूते फेंकना कोर्ट की अवमानना है, लेकिन यह संबंधित जज पर निर्भर करता है कि वो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करे या नहीं। अवमानना नोटिस जारी होने से उस वकील को बेवजह अहमियत मिलेगी। इसलिए इस मामले को तूल न दें, खुद दफन हो जाएगा। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वकील राकेश किशोर को अवमानना नोटिस जारी करने से इंकार कर दिया, जिसने इस महीने की शुरुआत में सीजेआई गवई पर जूता फेंकने का प्रयास किया था। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा घटना के महिमा मंडन के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने की दलीलों के बावजूद, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की बेंच ने मामले को एक सप्ताह के लिए टाल दिया। कोर्ट ने कहा-वह वकील को अनुचित महत्व देने के बजाय भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निवारक उपायों पर विचार करेगी।
सुनवाई के दौरान, एससीबीए अध्यक्ष विकास सिंह ने बहस करते हुए कहा- अदालत को संस्थागत कार्रवाई करनी चाहिए, क्योंकि सीजेआई की व्यक्तिगत माफी अदालत के खिलाफ हुए अपराध से अलग है। जब घटना हुई, तो उसे थोड़ी देर के लिए हिरासत में लिया गया और फिर छोड़ दिया गया। लेकिन उसके बाद उसका आचरण, यह कहना कि भगवान ने मुझे ऐसा करने के लिए कहा है। मैं इसे फिर से करूंगा। इसका महिमा मंडन किया जा रहा है! यह महिमा मंडन नहीं होना चाहिए।
सिंह ने चेतावनी दी कि निष्क्रियता से संस्था का बहुत अनादर होगा और लोग मजाक बना रहे हैं। उन्होंने बेंच पर नोटिस जारी करने के लिए दबाव डालते हुए कहा- अगर वह (माफी) नहीं मांगता है, तो उसे जेल भेजा जाना चाहिए। हालांकि, बेंच ने सीजेआई की अपनी प्रतिक्रिया का हवाला देते हुए स्थिति को बढ़ाने में गहरी अनिच्छा व्यक्त की। जस्टिस कांत ने स्वीकार किया, यह कृत्य एक गंभीर और घोर आपराधिक अवमानना है। लेकिन एक बार जब सीजेआई ने खुद माफ कर दिया है।
जस्टिस कांत ने पूछा- उस व्यक्ति को महत्व क्यों दिया जाए। इस भावना को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी दोहराया। मेहता ने आगाह किया, नोटिस जारी करने से सोशल मीडिया पर उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ सकती है। वह खुद को पीड़ित आदि कह सकता है। जस्टिस जयमाल्य बागची ने एक अलग रास्ता सुझाते हुए अवमानना अधिनियम की धारा 14 की ओर इशारा किया, जो अदालत के सामने अवमानना से संबंधित है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले संबंधित न्यायाधीश पर छोड़ दिए जाते हैं।
जस्टिस बागची ने कहा- और इस मामले में, सीजेआई ने अपनी शानदार उदारता में इसे नजरअंदाज करने का फैसला किया। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि अदालत को विरोधात्मक प्रक्रिया शुरू करने के बजाय निवारक उपायों पर दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। बेंच अंतत: इस बात पर सहमत हो गई और संबंधित रिट याचिकाओं को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया। जस्टिस कांत ने कहा-हम कुछ भी बंद नहीं कर रहे हैं। निवारक उपायों का सुझाव दें। हम एक सप्ताह बाद इस पर विचार करेंगे। उन्होंने कहा कि अदालत इसे उसी उदारता के साथ देखेगी जो सीजेआई ने दिखाई है।


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