केंद्रीय मंत्री ने कहा- अरावली पहाड़ियों और अरावली रेंज में क्या शामिल है, तो दुनिया भर के भूवैज्ञानिक, जो भूविज्ञान में काम करते हैं, रिचर्ड मर्फी द्वारा दी गई एक मानक परिभाषा को स्वीकार करते हैं कि 100 मीटर ऊंची पहाड़ी को पहाड़ माना जाता है।

अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है।
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह की कोई छूट नहीं दी गई है और न ही दी जाएगी। अरावली रेंज सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। हमारा प्रयास है कि ये पर्वत श्रृंखलाएं हरी-भरी रहें। यही नहीं, सुरक्षा के लिए मानक भी स्थापित किए जाने चाहिए। हमने ग्रीन अरावली वॉल आंदोलन भी शुरू किया, मुद्दा यह है कि अरावली रेंज की परिभाषा सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दो बातें कहीं, जिन्हें लोग छिपा रहे हैं। यह बात केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने एक खास चर्चा के दौरान कही। दरअसल, अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। इस पर मंत्री दो टूक शब्दों में पूरी स्थिति साफ कर दी है।
90 प्रतिशत क्षेत्र सुरक्षित
केंद्रीय मंत्री ने कहा- अरावली पहाड़ियों और अरावली रेंज में क्या शामिल है, तो दुनिया भर के भूवैज्ञानिक, जो भूविज्ञान में काम करते हैं, रिचर्ड मर्फी द्वारा दी गई एक मानक परिभाषा को स्वीकार करते हैं कि 100 मीटर ऊंची पहाड़ी को पहाड़ माना जाता है। सिर्फ उसकी ऊंचाई ही उसे पहाड़ के रूप में परिभाषित नहीं करती। ऊंचाई से लेकर जमीन के स्तर तक, पूरे 100 मीटर की सुरक्षा की जाती है और 90 प्रतिशत क्षेत्र सुरक्षित है।
58 प्रतिशत क्षेत्र कृषि भूमि
मंत्री ने कहा-100 मीटर का मतलब है पहाड़ की चोटी से लेकर जमीन के स्तर तक और उस बिंदु तक जहां उसका स्थायी आधार जमीन पर स्थित है, जिसमें पूरी संरचना शामिल है। अब तक, अरावली क्षेत्र में स्पष्ट परिभाषा की कमी के कारण, खनन परमिट में अनियमितताएं थीं। 58 प्रतिशत क्षेत्र कृषि भूमि है। फिर हमारे शहर, हमारे गांव, हमारी बस्तियां हैं। इसके अलावा, हमारे पास हमारा संरक्षित क्षेत्र है, जिसका 20 प्रतिशत संरक्षित क्षेत्र है। आप वहां कुछ भी नहीं कर सकते।
माइनिंग के लिए साइंटिफिक प्लान
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने कहा- नई माइनिंग के लिए, सुप्रीम कोर्ट की योजना है कि पहले एक साइंटिफिक प्लान होगा, इसमें आईसीएफआरई शामिल होगा। उसके बाद ही इस पर विचार किया जाएगा। लेकिन मैं बहुत साफ तौर पर कह रहा हूं कि 0.19 प्रतिशत से ज्यादा इलाके में यह संभव नहीं होगा। माइनिंग पहले से ही चल रही थी। उसी आधार पर परमिशन दी जा रही थी। लेकिन वहां जो हो रहा था वह गड़बड़ी और अवैध माइनिंग थी। प्रतिबंधित और वर्जित क्षेत्रों को साफ तौर पर परिभाषित करके, आप सख्त पालन सुनिश्चित कर सकते हैं।
सिर्फ पेड़ लगाना ही काफी नहीं
केंद्रीय मंत्री ने कहा- अरावली रेंज को सुरक्षा की जरूरत है। सिर्फ चारों ओर पेड़ लगाना ही काफी नहीं है। इस इकोलॉजी में घास, झाड़ियां और औषधीय पौधे शामिल हैं, जो एक इकोलॉजिकल सिस्टम का हिस्सा हैं और हमारे मंत्रालय द्वारा बनाए गए इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस का भी, तो, बिग कैट अलायंस का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि हम बाघों का संरक्षण करें। बल्कि एक बाघ तभी किसी जगह पर जिंदा रह सकता है, जब उसका शिकार और उसे सपोर्ट करने वाला पूरा इकोलॉजिकल सिस्टम भी मौजूद हो और हिरण और दूसरे जानवर तभी जिंदा रहेंगे जब उनके लिए घास और दूसरी वनस्पति होगी।
शहरीकरण की कोई योजना नहीं
शहरीकरण की ऐसी कोई योजना नहीं है। यह योजना पूरी तरह से सिर्फ अरावली की सुरक्षा के लिए है। मैं ऐसे कई शहरों के नाम बता सकता हूं जो पहले से ही अरावली में हैं। यह सदियों से इंसानों के रहने की जगह रही है। राज्यों को परिभाषा के आधार पर कड़े नियम बनाने होंगे, और 90 फीसदी इलाके में माइनिंग संभव नहीं है। मैं आपको सबसे बड़े माइनिंग जिलों का हिसाब बता रहा हूं, जिसमें राजसमंद और उदयपुर शामिल हैं। अवैध माइनिंग पूरी तरह से बंद कर दी जाएगी। कोर्ट जो भी नियम और कानून तय करेगा, हम उन्हें पूरी तरह से लागू करेंगे।

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