दिग्गज गायिका आशा भोसले के जीवन पर विशेष आलेख। जानें कैसे 16 की उम्र में शादी और निजी संघर्षों के बीच उन्होंने लता मंगेशकर की छाया से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाई और विश्व रिकॉर्ड कायम किए।

भारतीय संगीत जगत की सबसे चमकती और बहुमुखी प्रतिभा, आशा भोसले जी का जाना न केवल एक महान गायिका का जाना है, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत के उस स्वर्णिम अध्याय का अंत है, जिसने पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध किया। 80 साल से अधिक समय तक सक्रिय रहकर उन्होंने अपनी गायकी से यह सिद्ध किया कि प्रतिभा किसी एक सांचे में कैद नहीं होती।
आशा जी का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ हवाओं में भी संगीत था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय गायन के महारथी थे। मात्र 9 वर्ष की आयु में पिता के निधन ने परिवार पर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया। बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ मिलकर उन्होंने बहुत कम उम्र में ही घर की आर्थिक जिम्मेदारी संभाली और 1943 में मराठी फिल्म 'माझा बाळ' से अपनी आवाज का सफर शुरू किया।
आशा जी का व्यक्तिगत जीवन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। 16 साल की उम्र में उन्होंने परिवार के खिलाफ जाकर गणपतराव भोसले से विवाह किया। यह शादी उनके लिए मानसिक और आर्थिक रूप से अत्यंत कठिन रही। जब वे ससुराल से अलग हुईं, तब उनके साथ तीन बच्चे थे और भविष्य धुंधला था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी संतानों के बेहतर भविष्य के लिए फिर से गायकी के मैदान में डट गईं।
उस समय संगीत की दुनिया में लता मंगेशकर और गीता दत्त का एकाधिकार था। शुरुआती दिनों में आशा जी को केवल वो गाने मिलते थे जो मुख्य अभिनेत्रियों के नहीं होते थे। उन्होंने महसूस किया कि यदि उन्हें बड़ी बहन की परछाई से बाहर निकलना है, तो उन्हें अपनी अलग पहचान बनानी होगी। उन्होंने शास्त्रीय शुद्धता के साथ-साथ अपनी आवाज में वो चुलबुलापन और 'वेस्टर्न तड़का' विकसित किया, जिसने उन्हें दूसरों से बिल्कुल जुदा बना दिया।
आशा भोसले के करियर में संगीतकार ओ.पी. नैय्यर और आर.डी. बर्मन (पंचम दा) का अहम योगदान रहा। नैय्यर साहब ने उनकी आवाज की मस्ती को पहचाना और 'नया दौर' जैसी फिल्मों से उन्हें नई ऊंचाई दी। वहीं आर.डी. बर्मन के साथ मिलकर उन्होंने भारतीय पॉप संगीत का आधार रखा। 'दम मारो दम' और 'पिया तू अब तो आजा' जैसे गानों ने उन्हें युवाओं का धड़कन बना दिया। बाद में पंचम दा के साथ उनका वैवाहिक और संगीत का सफर भारतीय सिनेमा का सबसे चर्चित अध्याय बना।
आशा जी की सबसे बड़ी खूबी उनकी 'वर्सेटिलिटी' थी। जहाँ उन्होंने 'याई रे' जैसे आधुनिक पॉप गानों से डांस फ्लोर पर धूम मचाई, वहीं फिल्म 'उमराव जान' में 'दिल चीज क्या है' जैसी गजलें गाकर यह साबित कर दिया कि उनकी शास्त्रीय पकड़ बेमिसाल है। खय्याम साहब के संगीत निर्देशन में उन्होंने जो नजाकत दिखाई, उसने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा।
आशा भोसले का नाम दुनिया में सबसे अधिक स्टूडियो रिकॉर्डिंग करने वाली गायिका के रूप में 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में दर्ज है। उन्होंने 20 से अधिक भाषाओं में 12 हजार से ज्यादा गीतों को स्वर दिया। भारत सरकार ने उन्हें 2000 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार और 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। संगीत की दुनिया में वे ऐसी इकलौती कलाकार रहीं जिन्होंने अपनी मर्जी से अवार्ड लेना बंद कर दिया ताकि युवाओं को अवसर मिल सके।
आशा जी केवल एक गायिका ही नहीं, बल्कि एक शानदार कुक (Chef) और सफल उद्यमी भी थीं। उनके नाम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'आशा'ज' रेस्टोरेंट की चेन चलती है। वे हमेशा कहती थीं कि जीवन को भरपूर जीना चाहिए। उनकी यही जिंदादिली उनके मंच पर प्रदर्शन के दौरान भी दिखती थी, जहाँ 90 की उम्र में भी वे किसी युवा की तरह ऊर्जावान रहती थीं।
आज भले ही आशा ताई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली विरासत हर उस व्यक्ति के साथ रहेगी जो संगीत से प्यार करता है। उन्होंने मंगेशकर परिवार के नाम को एक ऐसी ऊंचाई दी, जहाँ तक पहुंचना मुमकिन नहीं है। वे भारतीय संगीत की वो 'आखिरी मुगल' थीं, जिन्होंने बदलते वक्त के साथ खुद को कभी पुराना नहीं होने दिया। उनका जीवन संघर्ष, जीत और संगीत की एक अद्भुत दास्तां है।

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