सतना के बरौंधा परिक्षेत्र में 1002 गिद्ध दर्ज किए गए, लेकिन एक भी अवयस्क गिद्ध नहीं मिला। वन विभाग की गणना ने गिद्धों की घटती नई पीढ़ी और भविष्य को लेकर गंभीर चिंता बढ़ा दी है।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
प्रदेश व्यापी गिद्ध गणना के अंतिम दिन सतना वनमंडल के आंकडेÞ ऊपर से देखा जाए तो आकर्षक लगते हैं। इसमें जिले में कुल 1 हजार 5 सौ 68 गिद्ध मौजूद हैं। लेकिन जब इन सरकारी आंकड़ों की गहराई से चीरफाड़ की जाती है, तोप्रकृति के इस सबसे बड़े ‘सफाईकर्मी’ के भविष्य को लेकर एक बेहद डरावनी और चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। वन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, सतना वनमंडल का बरौंधा परिक्षेत्र 1 हजार 2 गिद्धों के साथ जिले का सबसे बड़ा गढ़ बनकर उभरा है। यहां रिकॉर्ड 904 इंडियन लॉन्ग-बिल्ड (देशी लंबी चोंच वाले) और 79 इजिप्शियन गिद्ध दर्ज किए गए हैं। लेकिन इस भारी-भरकम संख्या के ठीक बगल वाले कॉलम में छिपा सच चौंकाने वाला है इतने बड़े गढ़ में अवयस्क गिद्धों की संख्या शून्य है।
सिंहपुर-चित्रकूट में बोझ
पूरे सतना जिले में अगर गिद्धों का वंश आगे बढ़ भी रहा है, तो उसका पूरा बोझ अकेले सिंहपुर (57 अवयस्क) और चित्रकूट (22 अवयस्क) परिक्षेत्रों पर टिका हुआ है। बाकी के चार बड़े रेंज इस मामले में पूरी तरह सूखे पड़े हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ पेड़ों और पहाड़ों पर बैठे वयस्क गिद्धों को गिनकर खुश होना खुद को धोखे में रखने जैसा है। गिद्धों की औसत उम्र पूरी होने के बाद जब ये वयस्क पक्षी खत्म होंगे, तो उनकी जगह लेने के लिए पीछे नई पीढ़ी मौजूद ही नहीं है। ऐसे में यह आबादी अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।
मात्र 5 फीसदी ही युवा पक्षी
पूरी रिपोर्ट का सबसे संवेदनशील और डरावना पहलू यह है कि जिले के कुल 1,568 गिद्धों में से वयस्क पक्षी तो 1,487 हैं, लेकिन नई पीढ़ी यानी अवयस्क केवल 81 ही बचे हैं। यानी पूरी आबादी में बच्चों की हिस्सेदारी मात्र 5.1 प्रतिशत रह गई है।
परिक्षेत्र वार स्थिति


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