अदालत ने सीलिंग की प्रक्रिया में बरती जा रही लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रहवासी क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां नहीं होनी चाहिए और सीलिंग या डिमोलिशन की कार्रवाई बिना किसी रुकावट के जारी रहेगी।

भोपाल के रहवासी इलाकों में कमर्शियल गतिविधियों और अवैध निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को करीब तीन घंटे तक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अदालत ने सीलिंग की प्रक्रिया में बरती जा रही लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रहवासी क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां नहीं होनी चाहिए और सीलिंग या डिमोलिशन की कार्रवाई बिना किसी रुकावट के जारी रहेगी। अदालत ने निर्देश दिया कि जिन क्षेत्रों का लैंड यूज स्पष्ट नहीं है या जहां मिक्स्ड लैंड यूज है, वहां हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा, लेकिन शुद्ध रूप से आवासीय उपयोग वाले इलाकों में नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने पिछले 21 सालों से अटके भोपाल के नए मास्टर प्लान का ड्राफ्ट जारी करने की अनुमति मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सहमति जताते हुए ड्राफ्ट जारी करने को हरी झंडी दे दी है। हालांकि, अदालत ने यह शर्त रखी है कि मास्टर प्लान के फाइनल प्रकाशन से पहले कोर्ट को इसकी पूरी जानकारी देनी होगी। इसके साथ ही यह भी साफ कर दिया गया है कि जब तक नया मास्टर प्लान पूरी तरह लागू नहीं हो जाता, तब तक रहवासी इलाकों में सीलिंग और डिमोलिशन की कार्रवाई पर रोक नहीं लगेगी। इस मामले की अगली सुनवाई आगामी 23 नवंबर को तय की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले भोपाल के रहवासियों की करीब 10 शिकायतें एमिकस क्यूरी एके सिन्हा के माध्यम से अदालत तक पहुंचाई गई थीं। इन शिकायतों में खुलासा हुआ कि नगर निगम द्वारा अगस्त में जिन प्रतिष्ठानों को सील किया गया था, उनमें से कई दुकानें दिन में बंद रहती हैं लेकिन शाम ढलते ही दोबारा खुल जाती हैं। इस खुलासे के बाद कोर्ट ने प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताया। कोर्ट के समक्ष यह मुख्य मुद्दा उठाया गया कि कागजों पर सीलिंग की कार्रवाई बड़े पैमाने पर दिखाई जा रही है, लेकिन जमीन पर इसका असर कई जगहों पर नजर नहीं आ रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान मध्यप्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील केएन नटराजन ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि इस विषय पर सरकार से चर्चा हो चुकी है और अब कोई नई कमेटी नहीं बनाई जाएगी। साथ ही, सीलिंग की कार्रवाई में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं की जाएगी। गौरतलब है कि इससे पहले राज्य सरकार ने सीलिंग से जुड़े मामलों की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताते हुए रोक लगा दी थी। बाद में कमेटी के गठन को लेकर अवमानना का मुद्दा भी उठा था, जिस पर सरकार के इस नए आश्वासन के बाद कोर्ट ने राहत दी है। हालांकि, अवमानना को लेकर अंतिम स्थिति लिखित आदेश के आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि भोपाल शहर के लिए वर्ष 1995 के बाद से कोई नया मास्टर प्लान नहीं बनाया गया है। यहां तक कि वर्ष 2005 में लागू किया गया मास्टर प्लान भी अपनी तय अवधि पूरी कर चुका है, जिसके चलते शहर का अधिकांश विकास पुराने और अप्रचलित मास्टर प्लान के आधार पर ही चल रहा है। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के गत 5 अगस्त के निर्देश के बाद नगर निगम ने आवासीय क्षेत्रों में चल रही कमर्शियल गतिविधियों के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया था। निगम द्वारा शहरभर में लगभग 15 दिनों तक नोटिस बांटने की प्रक्रिया चलाई गई थी। कुल 62,500 दर्ज दुकानों में से 8,084 प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी किए गए थे, जिनमें से लगभग 190 दुकानों को शुरुआती चरण में सील या बंद करने की कार्रवाई की गई थी।
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