स्वास्थ्य मंत्रालय और DGHS ने देश भर के सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में एक बार इस्तेमाल होने वाले मेडिकल उपकरणों के दोबारा इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। जानें इसके कारण, नियम और उल्लंघन करने पर होने वाली कार्रवाई।

नई दिल्ली । स्टार समाचार वेब
देश भर के अस्पतालों में मरीजों की सेहत और उनके कानूनी अधिकारों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बेहद सख्त और सराहनीय कदम उठाया है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) द्वारा जारी किए गए नए और कड़े आदेश के अनुसार, अब देश के सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में एक बार इस्तेमाल होने वाले यानी 'सिंगल-यूज' (Single-Use) मेडिकल उपकरणों को धोकर, स्टरलाइज करके या सैनिटाइज करके दोबारा काम में लेने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। सरकार का यह निर्देश सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तुरंत प्रभाव से लागू करने के लिए कहा गया है ताकि मरीजों की जान और स्वास्थ्य के साथ हो रहे इस गंभीर खिलवाड़ को तुरंत रोका जा सके।
स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, एक बार इस्तेमाल होने वाले मेडिकल उपकरणों को कितनी भी आधुनिक तकनीकों से साफ या स्टरलाइज क्यों न कर लिया जाए, वे पूरी तरह से रोगाणुमुक्त और सुरक्षित नहीं हो पाते हैं। ऐसे उपकरणों की बनावट और जटिल डिजाइन के कारण उनमें पुराना जैविक कचरा, सूक्ष्म बैक्टीरिया और वायरस छिपे रह जाते हैं, जो दोबारा इस्तेमाल करने पर सीधे तौर पर स्वस्थ मरीज के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। स्वास्थ्य महानिदेशालय ने अपनी चेतावनी में स्पष्ट किया है कि इस प्रकार की लापरवाही से मरीजों में हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और एचआईवी (HIV) जैसी लाइलाज और जानलेवा बीमारियां फैलने का सबसे बड़ा जोखिम रहता है। इसके साथ ही, अस्पतालों के भीतर होने वाले गंभीर बैक्टीरियल और फंगल इन्फेक्शन का अतिरिक्त बोझ भी सीधे तौर पर बेबस मरीजों पर आ पड़ता है।
सरकारी स्तर पर की गई गहन जांच और छापों में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि देश के कई प्रतिष्ठित और बड़े अस्पतालों के बेहद संवेदनशील विभागों में भी इन नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं। कार्डियोलॉजी विभाग में दिल की बीमारियों के इलाज के दौरान काम आने वाले महंगे कार्डियक कैथेटर, गाइडवायर और बैलून कैथेटर को मरीजों की जान जोखिम में डालकर बार-बार इस्तेमाल किया जा रहा था। इसके अलावा, नेफ्रोलॉजी यानी किडनी के इलाज से जुड़े महत्वपूर्ण विभागों में डायलाइजर और ब्लड ट्यूबिंग को भी धोकर दोबारा काम में लेने के कई मामले पकड़े गए हैं। इतना ही नहीं, कैंसर और न्यूरोसर्जरी जैसे अत्यंत नाज़ुक विभागों में भी सर्जिकल स्टेपलर, लेप्रोस्कोपिक ट्रॉकर और ऑपरेशन में काम आने वाली सुइयों को बार-बार उपयोग में लाए जाने की गंभीर शिकायतें लगातार मिल रही थीं।
इस देशव्यापी पाबंदी के पीछे केवल स्वास्थ्य और संक्रमण से जुड़े कारण ही नहीं छिपे हैं, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी का पहलू भी शामिल है। सरकार को लगातार ऐसी पुख्ता शिकायतें मिल रही थीं कि कई नामी-गिरामी कॉर्पोरेट और निजी अस्पताल सिंगल-यूज उपकरणों को मामूली रूप से साफ कर नए मरीज पर इस्तेमाल तो कर रहे थे, लेकिन उस नए मरीज से बिल के नाम पर बिल्कुल नए और महंगे उपकरणों की पूरी कीमत वसूली जा रही थी। स्वास्थ्य महानिदेशालय ने इसे स्पष्ट रूप से गैरकानूनी करार देते हुए कहा है कि यह घिनौनी हरकत ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940, क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट 2010 और बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट के मौजूदा कड़े प्रावधानों और नियमों का सीधा उल्लंघन है।
केंद्र सरकार के इस नए और कड़े आदेश के बाद देश भर का स्वास्थ्य प्रशासन पूरी तरह से सतर्क और मुस्तैद हो गया है। सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, स्वास्थ्य विभागों के प्रमुखों और राज्य ड्रग कंट्रोलर्स को यह स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों के सभी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर पैनी नजर रखें। ड्रग इंस्पेक्टरों और वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों की विशेष टीमों को औचक निरीक्षण (सरप्राइज चेकिंग) करने के निर्देश जारी किए गए हैं। यदि निरीक्षण के दौरान कोई भी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल नियमों की अवहेलना करता हुआ या मूल निर्माता (Original Manufacturer) के निर्देशों के विपरीत जाकर सिंगल-यूज उपकरणों को दोबारा इस्तेमाल करता हुआ पाया गया, तो उस अस्पताल के खिलाफ अत्यंत कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी और दोषी पाए जाने पर अस्पताल का लाइसेंस तक हमेशा के लिए रद्द कर दिया जाएगा।
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स्वास्थ्य मंत्रालय और DGHS ने देश भर के सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में एक बार इस्तेमाल होने वाले मेडिकल उपकरणों के दोबारा इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। जानें इसके कारण, नियम और उल्लंघन करने पर होने वाली कार्रवाई।
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