चित्रकूट के थरपहाड़ गांव में बीमार युवक को अस्पताल पहुंचाने ग्रामीणों को कंधे का सहारा लेना पड़ा। सड़क सुविधा के अभाव ने स्वास्थ्य सेवाओं और विकास के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
इसे विकास की तस्वीर कहें या व्यवस्था की विडंबना? जिस दौर में गांव-गांव तक सड़क पहुंचाने और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे किए जा रहे हैं, उसी दौर में चित्रकूट नगर परिषद क्षेत्र के थरपहाड़ गांव में किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं, बल्कि ग्रामीणों के कंधे सहारा बन रहे हैं। 28 वर्षीय गोरे सिंह पिता बब्बू सिंह की अचानक तबीयत बिगड़ी तो लगातार उल्टी-दस्त के कारण वह बेहद कमजोर हो गए। अस्पताल ले जाने की जरूरत थी, लेकिन गांव तक सुगम रास्ता नहीं होने के कारण मरीज को कंधे पर उठाकर मुख्य मार्ग तक ले जाना पड़ा।इलाज के बाद जब गोरे सिंह को वापस गांव लाया गया, तब भी मुश्किल खत्म नहीं हुई। मुख्य मार्ग से गांव तक पहुंचने के लिए फिर ग्रामीणों को मरीज का भार अपने कंधों पर उठाना पड़ा। यह पूरा घटनाक्रम उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, जिसके भरोसे गांव के लोग अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं।
मरीज बीमार या व्यवस्था?
थरपहाड़ के ग्रामीणों के लिए यह समस्या नई नहीं है। उनका कहना है कि गांव में किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ने पर बीमारी से पहले उसे अस्पताल तक पहुंचाने की चिंता सताने लगती है। बुजुर्ग हों, गंभीर मरीज हों या गर्भवती महिलाएं,आपात स्थिति में समय पर मुख्य मार्ग तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। ग्रामीणों के अनुसार कई बार मरीज को झोली, टाट अथवा अन्य साधन में रखकर कंधे पर उठाना पड़ता है। सवाल यह है कि यदि किसी मरीज की हालत गंभीर हो और हर मिनट महत्वपूर्ण हो, तो कंधे के सहारे अस्पताल तक पहुंचने की यह व्यवस्था कितनी सुरक्षित है?
कागजों में सड़क, जमीन पर इंतजार
ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण को लेकर लंबे समय से आश्वासन दिए जा रहे हैं। कभी निविदा की बात होती है तो कभी स्वीकृति की प्रक्रिया का हवाला दिया जाता है। लेकिन गांव में पहुंचकर देखने पर निर्माण कार्य के नाम पर कुछ दिखाई नहीं देता। ग्रामीणों का कहना है कि जिम्मेदारों से सड़क निर्माण की जानकारी मांगने पर भोपाल स्तर पर स्वीकृति लंबित होने जैसी बातें बताई जाती हैं। यदि स्वीकृति लंबित है तो ग्रामीणों को अब तक निर्माण शीघ्र शुरू होने के आश्वासन क्यों दिए जाते रहे? और यदि प्रक्रिया पूरी हो चुकी है तो काम शुरू होने में आखिर देरी किस स्तर पर है?
नगर परिषद क्षेत्र फिर भी बुनियादी सुविधा से दूर
थरपहाड़ नगर परिषद क्षेत्र का हिस्सा है। इसके बावजूद सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए ग्रामीणों को वर्षों से इंतजार करना पड़ रहा है। यह सिर्फ आवागमन का संकट नहीं है। सड़क का सीधा संबंध स्वास्थ्य सेवाओं, बच्चों की पढ़ाई, कृषि उपज के परिवहन, रोजगार और रोजमर्रा की जरूरतों से है। बरसात या खराब मौसम में समस्या और गंभीर हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाते और ग्रामीणों को पैदल ही मरीज या अन्य जरूरी सामान लेकर मुख्य मार्ग तक जाना पड़ता है।
तस्वीर ने खोल दी विकास की पोल
गोरे सिंह को उपचार के लिए कंधे पर उठाकर ले जाने और वापस लाने की घटना ने एक बार फिर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर सामने ला दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें यह जानना है कि सड़क कब बनेगी, निर्माण कब शुरू होगा और तब तक आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा? प्रशासन और नगर परिषद के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि थरपहाड़ के ग्रामीणों को सड़क कब मिलेगी और कब तक मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों के कंधे ही एंबुलेंस बने रहेंगे?


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