भारत में उच्च शिक्षा के बजट को लेकर संसदीय समिति ने जताई चिंता। NEP 2020 के लक्ष्यों और GDP का 6% खर्च करने की सिफारिश के बारे में विस्तार से जानें।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए शिक्षा बजट में भारी वृद्धि की आवश्यकता है। एक संसदीय समिति ने सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने की सलाह दी है।
देश की शिक्षा व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने और एनईपी-2020 के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए शिक्षा पर खर्च बढ़ाना अनिवार्य हो गया है। राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली 'शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति' ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चिंता जताई है कि वर्तमान बजट आवंटन उच्च शिक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
संसदीय समिति ने रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि 2025-26 के लिए उच्च शिक्षा विभाग का बजट अनुमान पिछले वर्षों की तुलना में अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ा है। समिति के अनुसार, बढ़ती महंगाई को देखते हुए बजट में कम से कम 8 से 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी होनी चाहिए थी। यदि आवंटन इसी तरह सीमित रहा, तो उच्च शिक्षा के संसाधनों और वास्तविक खर्च पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) में केंद्र और राज्य सरकारों को शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाकर GDP का 6 प्रतिशत करने का लक्ष्य दिया गया था। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार, 2021-22 में भारत का कुल शिक्षा व्यय GDP का मात्र 4.12 प्रतिशत रहा। समिति का मानना है कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए निवेश का यह आंकड़ा बढ़ाना बेहद जरूरी है।
तुलनात्मक स्थिति (शिक्षा पर खर्च - GDP का प्रतिशत):
भूटान: 7.47%
मालदीव: 4.67%
भारत: 4.12%
NEP-2020 लक्ष्य (भारत): 6.00%
समिति ने 2018-2023 के बीच सकल नामांकन अनुपात (GER) का भी विश्लेषण किया, जिसमें कोई खास उछाल नहीं दिखा है। समिति का जोर इस बात पर है कि रोजगारोन्मुख शिक्षा को बढ़ावा देने और मानव संसाधन विकास के लिए उच्च शिक्षा में छात्रों का नामांकन बढ़ाना जरूरी है।
सरकार ने समिति को जानकारी दी कि बजट आवंटन विभिन्न विभागों की आवश्यकताओं और वित्त मंत्रालय की तय सीमाओं के आधार पर किया जाता है। 2025-26 के लिए उच्च शिक्षा विभाग का बजट अनुमान 50,077.95 करोड़ रुपये था, जिसे बाद में बढ़ाकर 51,381.67 करोड़ रुपये किया गया। सरकार ने आश्वासन दिया है कि वित्तीय नियमों के दायरे में रहकर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
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