भारत और चीन के बीच सीमा विवाद फिर गहरा गया है। अरुणाचल प्रदेश में 27 भौगोलिक स्थानों के आधिकारिक नामकरण के बाद चीन की बौखलाहट पर विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि बॉर्डर पर शांति के बिना द्विपक्षीय संबंधों में सुधार संभव नहीं है।

चीन। स्टार समाचार वेब
भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव एक बार फिर से चरम पर पहुंच गया है। विदेश मंत्रालय (MEA) की हालिया मीडिया ब्रीफिंग में भारतीय प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बीजिंग को बेहद स्पष्ट और कड़े शब्दों में समझा दिया है कि भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा का मुद्दा सर्वोपरि है। भारत ने दो-टूक शब्दों में कह दिया है कि यदि दोनों देशों के संबंधों में सुधार लाना है, तो चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तय नियमों और शर्तों का पूरी तरह पालन करना होगा। यह पूरा विवाद तब गरमाया जब भारत ने अरुणाचल प्रदेश में अपनी संप्रभुता को मजबूत करते हुए एक बड़ा कदम उठाया।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान भारत के कड़े रुख को दोहराते हुए इस बात पर जोर दिया कि सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थिति ही दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों की दिशा तय करेगी। जब तक बॉर्डर के इलाकों में पूरी तरह से शांति और स्थिरता बहाल नहीं होती, तब तक दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य नहीं हो सकते।
भारत ने किसी भी प्रकार की रणनीतिक गलतफहमी (Miscalculation) से बचने की सख्त नसीहत दी है। रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के पास जितने भी कूटनीतिक और सैन्य बातचीत के माध्यम मौजूद हैं, उनका उपयोग किया जाएगा। भारत का हमेशा से यह दृष्टिकोण रहा है कि जटिल मुद्दों का समाधान केवल शांतिपूर्ण संवाद के जरिए ही संभव है, लेकिन इसके लिए सीमा पर शांति का होना अनिवार्य शर्त है।
इस ताज़ा भू-राजनीतिक विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश में अपने प्रशासनिक नियंत्रण और क्षेत्रीय संप्रभुता को और अधिक पुख्ता करने के लिए एक अहम कदम उठाया। भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने अरुणाचल प्रदेश के 27 महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थानों के मानक नामों को आधिकारिक नक्शे पर विधिवत दर्ज कर दिया।
इन 27 स्थानों में चार प्रमुख पहाड़ी दर्रे, एक उच्च तुंगता वाली झील (High-altitude lake), रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील कई मैदानी व पहाड़ी क्षेत्र और एक ऐतिहासिक युद्ध स्मारक शामिल है। इस कदम के पीछे भारत का मुख्य उद्देश्य देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के भीतर सही भौगोलिक पहचान दर्ज करना, आम नागरिकों के बीच इन क्षेत्रों के सामरिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना और चीन की उस कुत्सित चाल का मुंहतोड़ जवाब देना था, जिसके तहत वह लगातार भारतीय क्षेत्रों के मनगढ़ंत नाम बदलने का षड्यंत्र रचता रहता है।
भारत के इस प्रशासनिक और संप्रभुता से जुड़े कदम के सामने आते ही बीजिंग में राजनीतिक खलबली मच गई। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने तुरंत तीखी प्रतिक्रिया देते हुए भारत के इस कदम का पुरजोर विरोध किया। चीन ने एक बार फिर से अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न हिस्सा मानने से इनकार कर दिया और भारत सरकार द्वारा जारी किए गए आधिकारिक नामों को ‘अवैध, अमान्य और शून्य’ करार देने की असफल कोशिश की।
चीन अपनी पुरानी विस्तारवादी मानसिकता के तहत अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोकते हुए इसे तिब्बती क्षेत्र ‘जांगनान’ या ‘दक्षिणी तिब्बत’ का हिस्सा बताता रहा है। बीजिंग का तर्क है कि भारत के ऐसे एकतरफा फैसलों से इस क्षेत्र की यथास्थिति नहीं बदलेगी और इससे दोनों देशों के बीच चल रही बॉर्डर टॉक प्रभावित हो सकती है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भारत ने अपने आधिकारिक नक्शों और नामों को अपडेट करने की यह घोषणा दोनों देशों के बीच हुई एक बेहद अहम राजनयिक बैठक के तुरंत बाद की। दरअसल, भारत और चीन के बीच सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए बने कार्यकारी तंत्र (WMCC) की 36वीं बैठक नई दिल्ली में आयोजित की गई थी।
इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों पक्ष एलएसी (LAC) पर शांति बनाए रखने और कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से बातचीत जारी रखने पर सहमत हुए थे। हालांकि, इसके तुरंत बाद भारत के इस आंतरिक प्रशासनिक कदम पर चीनी सरकारी मीडिया और वहां के सामरिक विशेषज्ञों ने तीखी और भड़काऊ प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं। चीनी विशेषज्ञों ने इसे भारत की तरफ से संबंधों को सामान्य करने की कोशिशों के विपरीत बताया।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह सख्त कदम असल में चीन की उस पुरानी और नापाक चालबाजी का सीधा जवाब है, जिसे वह पिछले कई वर्षों से लगातार अपनाता आ रहा है। वर्ष 2017 से ही चीन का नागरिक मामलात मंत्रालय अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न इलाकों के फर्जी चीनी और तिब्बती नामों की सूचियां जारी करता रहा है। चीन अब तक अरुणाचल प्रदेश के 100 से अधिक स्थानों के कृत्रिम नाम अपनी तरफ से सार्वजनिक कर चुका है।
बीजिंग का यह भ्रम है कि नक्शों पर मनगढ़ंत चीनी नाम लिख देने से वह उन क्षेत्रों पर अपना भू-राजनीतिक दावा मजबूत कर लेगा। हालांकि, भारत ने हर मंच पर चीन के इन आधारहीन दावों को सिरे से खारिज किया है। भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अटूट और अभिन्न अंग था, है और हमेशा रहेगा। किसी अन्य देश द्वारा कागजों पर नाम बदल देने से ज़मीनी हकीकत और अंतरराष्ट्रीय सत्यता कभी नहीं बदल सकती।

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