केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित परिवार पुनर्वास स्थलों पर मूलभूत सुविधाओं के अभाव में तिरपाल और झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। मुआवजा मिलने के बावजूद स्थायी पुनर्स्थापन और बुनियादी व्यवस्थाओं का इंतजार जारी है।

हाइलाइट्स:
पन्ना, स्टार समाचार वेब
देश की पहली नदी जोड़ो राष्ट्रीय परियोजना केन-बेतवा लिंक परियोजना को बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने वाली योजना बताया जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकार इसे सिंचाई, पेयजल और विकास की दृष्टि से ऐतिहासिक परियोजना मान रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आगामी दिनों परियोजना का भूमिपूजन प्रस्तावित है। लेकिन दूसरी ओर इस महत्वाकांक्षी योजना से प्रभावित और विस्थापित परिवारों की स्थिति प्रशासनिक दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। करोड़ों रुपये के मुआवजे और पुनर्वास पैकेज के बावजूद सैकड़ों लोग आज भी स्थायी पुर्नस्थापन और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गौरतलब है कि केन-बेतवा परियोजना के तहत पन्ना जिले के गहदरा, कटहरी-बिलहटा, मझौली, कोनी, डोंडी, खमरी, कूड़न और मरहा गांव प्रत्यक्ष प्रभावित न होते हुए भी परियोजना की भेंट चढ़ गए। परियोजना के लिए पन्ना जिले में 915.685 हेक्टेयर शासकीय भूमि और 693.859 हेक्टेयर निजी भूमि अधिग्रहित कर वन विभाग को हस्तांतरित की जा चुकी है। जिला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार 644 भू-स्वामियों को भूमि अधिग्रहण के एवज में 92 करोड़ 98 लाख 55 हजार 687 रुपये की मुआवजा राशि स्वीकृत की गई थी, जिसमें से 83 करोड़ 29 लाख 30 हजार 743 रुपये से अधिक राषि का भुगतान किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त पूरक प्रस्तावों के तहत 1291 हितग्राहियों को 65 करोड़ 5 लाख 65 हजार रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी। भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुर्नस्थापन अधिनियम 2013 के तहत प्रभावित परिवारों को 12.50 लाख रुपये प्रति परिवार पुनर्वास पैकेज दिया गया। प्रशासन के अनुसार 1231 परिवारों के लिए 153 करोड़ 87 लाख 50 हजार रुपये स्वीकृत किए गए। लेकिन विस्थापितों का कहना है कि केवल एकमुश्त राशि देकर प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, जबकि पुनर्वास और पुर्नस्थापन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आज भी अधूरा है।
पटी कल्याणपुर में बसाए गए 84 परिवार, सुविधाएं नदारद
पन्ना शहर से लगे पटी कल्याणपुर क्षेत्र में कोनी और अन्य प्रभावित गांवों के करीब 84 परिवारों को शासकीय भूमि पर बसाया गया है। यहां प्रशासन ने 30-50 फीट के प्लॉट चिन्हित कर दिए हैं, लेकिन परिवारों को जमीन के वैधानिक पट्टे नहीं मिले हैं। स्थिति यह है कि लोग तिरपाल, टीन और घास-फूस के अस्थायी घर बनाकर रहने को मजबूर हैं। बरसात का मौसम सिर पर है, लेकिन अधिकांश परिवारों के पास सुरक्षित आवास नहीं है। पुनर्वास स्थल पर न पक्की सड़क है, न बिजली की व्यवस्था और न ही पर्याप्त पेयजल सुविधा। पूरे क्षेत्र के लिए सिर्फ एक हैंडपंप लगाया गया है। वर्ष 2023 में जिला प्रशासन ने पुनर्वासित गांवों में सड़क, बिजली, शुद्ध पेयजल, शौचालय, स्वास्थ्य सेवाएं, स्कूल, आंगनबाड़ी, खेल मैदान, परिवहन सुविधा और पशुओं के लिए चारागाह विकसित करने का आश्वासन दिया था। लेकिन विस्थापित परिवारों का आरोप है कि अधिकांश सुविधाएं आज भी कागजों में ही सीमित हैं।
विकास के नाम पर ठगे गए विस्थापित
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने राष्ट्रीय परियोजना के लिए अपनी जमीन, घर और पुश्तैनी गांव छोड़ दिए, लेकिन बदले में उन्हें केवल मुआवजा राशि मिली, सम्मानजनक पुर्नस्थापन नहीं। जिन परिवारों के पास कभी खेती, पशुपालन और स्थायी आवास था, वे आज अस्थायी बस्तियों में भविष्य की अनिश्चितता के बीच जीवन बिता रहे हैं। विस्थापित परिवारों का कहना है कि उनके पास मुआवजे का इतना पैसा नहीं हैं, कि वे प्लाट खरीदकर घर बना सकें, प्रषासन ने जो उन्हें जमीन दी है, उसका कोई पट्टा नहीं है, ऐसे में यहां पैसा लगाकर घर बनाना जोखिम का काम है, इस लिए तिरपाल डालकर जिंदगी बिता रहे हैं। विदित हो कि बिना मूलभूत सुविधाओं के कॉलोनी बनाने वाले कॉलोनाईजरों पर प्रषासन कार्यवाही करता है, लेकिन खुद प्रषासन द्वारा बिना मूलभूत सुविधाओं के लोगों को बसाया गया, इस पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह मामला विस्थापन के दंष की कहानी को बयां करने के लिए काफी है।
पटी के पास विस्थापितों को बसाया गया है, धीरे-धीरे सुविधाएं हो जायेंगी, आगे चलकर पट्टे देने का काम भी करेंगे, फिलहाल उन्हें रहने के लिए जमीन दी गई है।
संजय कुमार नागवंषी, एसडीएम पन्ना


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