हर साल 3 जुलाई 2025 को "अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस" मनाया जाता, जो हमें प्लास्टिक प्रदूषण के गंभीर संकट की याद दिलाता है। मानव निर्मित इस सुविधा ने अब हमारे ग्रह और समस्त जीव सृष्टि के लिए विनाश का बिगुल फूंक दिया है।

स्टार समाचार. फीचर डेस्क
हर साल 3 जुलाई 2025 को "अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस" मनाया जाता, जो हमें प्लास्टिक प्रदूषण के गंभीर संकट की याद दिलाता है। मानव निर्मित इस सुविधा ने अब हमारे ग्रह और समस्त जीव सृष्टि के लिए विनाश का बिगुल फूंक दिया है।
प्लास्टिक प्रदूषण: एक वैश्विक खतरा
प्लास्टिक प्रदूषण आज धरती, आकाश, जल और हवा, हर जगह जीवन के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। हम अक्सर देखते हैं कि प्रतिबंध के बावजूद प्लास्टिक बैग और अन्य सामग्री का अवैध उपयोग धड़ल्ले से जारी है। यह हमारी जीवन चक्र को बाधित कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, हर साल 460 मिलियन मीट्रिक टन से ज़्यादा प्लास्टिक का उत्पादन होता है। इसमें से अधिकांश, लगभग 88 प्रतिशत (20 मिलियन मीट्रिक टन), मैक्रोप्लास्टिक के रूप में पर्यावरण में चला जाता है, जिससे सभी पारिस्थितिकी तंत्र प्रदूषित होते हैं। दुनिया का ज़्यादातर प्लास्टिक प्रदूषण बोतलों, कैप, शॉपिंग बैग, कप, स्ट्रॉ जैसे सिंगल-यूज़ उत्पादों से आता है।
यूएनईपी 2025 के अनुसार, अब तक उत्पादित प्लास्टिक का केवल 9% ही रीसाइकिल किया गया है। बाकी वातावरण में प्रदूषण के रूप में मौजूद है। ईएमएफ 2016 का अनुमान है कि 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक हो सकता है। यह समुद्री जीवन के लिए एक बड़ा खतरा है, क्योंकि हर साल समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से 100,000 से अधिक समुद्री स्तनधारी और दस लाख समुद्री पक्षी मारे जाते हैं।
प्लास्टिक और मानव स्वास्थ्य
प्लास्टिक प्रदूषण केवल पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कहते हैं, हमारे भोजन, पीने के पानी और हवा के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। नैनोप्लास्टिक तो शरीर में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं और दिल, फेफड़े, लीवर, तिल्ली, गुर्दे और दिमाग में भी पाए गए हैं। हाल के अध्ययनों में तो नवजात शिशुओं के प्लेसेंटा में भी माइक्रोप्लास्टिक पाए गए हैं। प्लास्टिक से निकलने वाले 4,219 से अधिक रसायन चिंता का विषय हैं।
खासकर गर्म खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग में प्लास्टिक का उपयोग बेहद घातक है। जब गर्म भोजन प्लास्टिक के संपर्क में आता है, तो हानिकारक रसायन उसमें घुल जाते हैं, जिससे जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
भारत की स्थिति
भारत में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक की खपत बढ़कर 11 किलोग्राम प्रति वर्ष हो गई है। नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत प्लास्टिक प्रदूषण में दुनिया का सबसे बड़ा योगदानकर्ता बन गया है, जो कुल वैश्विक प्लास्टिक कचरे का लगभग 20 प्रतिशत है। भारत में प्रतिवर्ष 9.3 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। दुर्भाग्यवश, भारत में दैनिक प्लास्टिक कचरे का केवल 8-10% ही पुनर्चक्रित किया जाता है, बाकी को या तो जला दिया जाता है या लैंडफिल और जलमार्गों में फेंक दिया जाता है।
समाधान और जागरूकता
प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए उपभोक्ता की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है। अगर हम प्लास्टिक से दूरी बना लें और उसके टिकाऊ विकल्पों को अपनाएं, तो समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है। हमें अपने स्वार्थ और आलस को छोड़कर सरकारी नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा। "उपयोग करो और फेंक दो" जैसी मानसिकता को छोड़ना होगा।
हमें प्लास्टिक कैरीबैग को पूरी तरह से भूल जाना चाहिए और खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग में प्लास्टिक का उपयोग टालना चाहिए। प्लास्टिक आज सुविधा तो है, लेकिन जीवनभर की दुविधा भी है। पर्यावरण हमें बेहतर जीवन देने के लिए है, और अगर हम ही इसे बर्बाद करेंगे, तो यह हमें जीवन नहीं, बल्कि बर्बादी ही देगा। एक जागरूक नागरिक के रूप में, हमें इस गंभीर समस्या को समझना होगा और इसके खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।
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