विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची से 15 दिनों में चौथी बार बात की। जानें होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे जहाजों और पश्चिम एशिया संकट पर क्या हुई चर्चा।
By: Ajay Tiwari
Mar 13, 20263:46 PM
नई दिल्ली:
पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत की कूटनीतिक सक्रियता चरम पर है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गुरुवार रात अपने ईरानी समकक्ष सैयद अब्बास अराघची से फोन पर चर्चा की। पिछले 15 दिनों के भीतर दोनों नेताओं के बीच यह चौथी महत्वपूर्ण बातचीत है, जो क्षेत्र की संवेदनशीलता और भारत के हितों की गंभीरता को दर्शाती है।
पश्चिम एशिया में संघर्ष की शुरुआत के बाद से ही भारत और ईरान के बीच संवाद का सिलसिला तेज हो गया है। विशेष रूप से 28 फरवरी को अमेरिकी हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद स्थितियां काफी अस्थिर हो गई हैं।
पहली वार्ता: 28 फरवरी (सुप्रीम लीडर की मृत्यु के तुरंत बाद)
दूसरी वार्ता: 5 मार्च
तीसरी वार्ता: 10 मार्च
चौथी वार्ता: 13 मार्च (गुरुवार रात)
विदेश मंत्री जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस बातचीत में न केवल द्विपक्षीय संबंधों और ब्रिक्स (BRICS) से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी गहन मंथन किया गया।
इस बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा है। ईरान द्वारा इस रणनीतिक मार्ग को आंशिक रूप से अवरुद्ध किए जाने के कारण 28 व्यापारिक जहाज वहां फंसे हुए हैं।
भारत के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। भारतीय ध्वज वाले जहाजों के लिए सुरक्षित गलियारा सुनिश्चित करना नई दिल्ली की सर्वोच्च प्राथमिकता है। तेहरान द्वारा मार्ग बाधित किए जाने से दुनिया भर में ईंधन की कीमतें बढ़ने और ऊर्जा संकट गहराने का खतरा पैदा हो गया है।
नई दिल्ली लगातार अमेरिका, इजरायल और ईरान के साथ संपर्क बनाए हुए है ताकि संघर्ष को और फैलने से रोका जा सके। जयशंकर और अराघची की यह बार-बार होने वाली बातचीत संकेत देती है कि भारत पर्दे के पीछे से एक 'मध्यस्थ' या 'स्थिरता कारक' के रूप में बड़ी भूमिका निभा रहा है।