सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी। देवस्वोम बोर्ड ने अभिषेक मनु सिंघवी के जरिए रखी अपनी दलील। जानें 10 से 50 साल की महिलाओं के बैन पर क्या है पूरा विवाद

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
केरल के सुप्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर देश के शीर्ष न्यायालय में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने परंपराओं की रक्षा के लिए कड़ा रुख अपनाया।
बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने स्पष्ट किया कि सबरीमाला मंदिर की तुलना किसी सार्वजनिक स्थान, खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट से नहीं की जा सकती। उन्होंने दलील दी कि यहाँ के इष्टदेव भगवान अयप्पा 'आजन्म ब्रह्मचारी' के रूप में विराजमान हैं, और मंदिर की मर्यादा उनकी इसी विशिष्ट पहचान पर टिकी है।
सिंघवी ने तर्क दिया कि 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करना कोई भेदभाव नहीं, बल्कि देवता के स्वरूप का सम्मान करना है। उन्होंने आगे कहा कि पूरे भारत में भगवान अयप्पा के करीब एक हजार अन्य मंदिर मौजूद हैं, जहाँ महिलाओं के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है। ऐसे में केवल इसी विशिष्ट मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा को चुनौती देना तर्कसंगत नहीं है।
आस्था और सुधार के बीच संतुलन
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने गहरी टिप्पणी करते हुए कहा कि करोड़ों लोगों की अटूट आस्था को गलत ठहराना न्यायपालिका के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में से एक है। न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण बिंदु रखते हुए कहा कि सामाजिक सुधार (Social Reform) के नाम पर किसी धर्म के मूल स्वरूप या उसकी पहचान को खोखला नहीं किया जा सकता।
यह पूरा मामला 1991 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें केरल हाईकोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया था। हालांकि, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे भेदभावपूर्ण मानते हुए हटा दिया था। अब पुनर्विचार याचिकाओं के जरिए उठाए गए 7 संवैधानिक प्रश्नों पर गहन मंथन चल रहा है, जिसका उद्देश्य धर्म की स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन बनाना है।
सरकार और परंपरा का पक्ष
7 अप्रैल 2026 से शुरू हुई इस विशेष सुनवाई में केंद्र सरकार ने भी अपना पक्ष रखा है। सरकार का तर्क है कि भारत विविधताओं का देश है, जहाँ कई ऐसे मंदिर भी हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। अतः धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों का सम्मान किया जाना अनिवार्य है।

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