2023 में सतना जंक्शन को विश्वस्तरीय स्टेशन बनाने का सपना दिखाया गया था, लेकिन दो साल बीतने के बाद भी कोई निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ। पीएम गति शक्ति योजना के तहत घोषित यह प्रोजेक्ट अब तक ड्राइंग और डिज़ाइन तक ही सीमित है। स्टेशन पर सुविधाओं की कमी, अफसरशाही की सुस्ती और नेताओं की सवारी पर साफ-सफाई तक सीमित रेलवे की प्राथमिकता को उजागर करता है। पढ़ें करन उपाध्याय का ब्लॉग प्लेटफार्म।

हाईलाइट्स
जंक्शन में ट्रेन ही नहीं ‘विकास’ भी लेट
2023 में सतना जंक्शन को विश्वस्तरीय स्टेशन बनाने की नींव रखी गई थी। सतनावासियों को रानी कमलापति स्टेशन जैसी आधुनिक सुविधाओं का सपना दिखाया गया था। दो दर्जन लिफ्ट, एस्केलेटर, एयर कंडीशनर लाउंज और भव्य इमारतें बनने की उम्मीद थी, लेकिन दो साल बाद भी 'विकास' अभी तक स्टेशन तक नहीं पहुंचा। यह सपना प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट का हिस्सा है और पीएम गति शक्ति योजना में दिखाया गया था। हालांकि, हकीकत इसके नाम के बिल्कुल उलट है। 'गति शक्ति' के नाम पर काम कछुआ चाल से चल रहा है। आलम यह है कि स्टेशन निर्माण में अभी तक एक नई ईंट तक नहीं रखी गई। मामला केवल ड्राइंग और डिजाइन तक ही सीमित है। यात्री अब चुटकी ले रहे हैं.. स्टेशन पर केवल ट्रेनें ही नहीं, रेलवे का 'विकास' भी लेट है।
यात्रियों की नहीं, माननीय की नाराजगी की चिंता
पिछले रविवार का दिन था। किसी माननीय को दिल्ली सुपरफास्ट से दिल्ली जाना था। उनके आगमन से पहले तक स्टेशन में सफाई व्यवस्था पुराने ढर्रे पर थी, लेकिन जैसे ही संदेशा मिला कि आज माननीय आनंद विहार से जाएंगे, वैसे ही सफाई कर्मचारी टूट पड़े। मेन गेट को पांच मिनट में चमका कर रख दिया। दुर्गंध न आए, इसके लिए पाउडर का छिड़काव भी करवाया गया। यह व्यवस्था देख यात्री कानाफूसी कर रहे थे, रेलवे को अब यात्रियों की नहीं, माननीयों की नाराजगी की चिंता है। कहीं गंदगी देख नेताजी रेलवे बोर्ड में शिकायत न कर दें।
साहबी का मजा नहीं ले पा रहे रेल अधिकारी
कहते हैं कि बड़ी कुर्सी मिलते ही अधिकारियों के हावभाव बदल जाते हैं। चाल में रौब आ जाता है, फाइलें खुद-ब-खुद चलने लगती हैं, और चाय चार बार आने लगती है। पर रेलवे की हालत कुछ और बयां करती रही। रेलवे की एक शाखा का जिम्मा कामचलाऊ साहब के कंधों पर सौंपा गया था। इन साहब के कंधों पर इतना बोझ था कि वे अपनी शाखा की तरफ कम ध्यान दे पाए। एक कार्यालय का रुख करते तो दूसरे कार्यालय का काम बेपटरी हो जाता। उन्हें दो जिलों की जिम्मेदारी दी गई थी। कामचलाऊ साहब ठीक से कुर्सी में बैठ भी न पाए और फिर से बैकफुट में आ गए। कहते हैं कि जब काम का भार कम होना और रौब दिखाना था, तो बड़े साहब वाली कुर्सी ही छिन गई। अब क्या पता यह कुर्सी दोबारा नसीब होती है या नहीं।
तो हो गई क्या धुलाई?
स्टेशन में कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली जीआरपी को कौन नहीं जानता। लंबा डंडा, रौबदार चाल और चलती ट्रेन में सेल्फी लेने वाले युवकों को डराने वाली आवाज, "अबे उतर, चल ले चलेंगे थाने। हाल ही की बात है, कहते हैं कि एक युवक ने एक जीआरपी वाले का कॉलर पकड़ लिया। कॉलर ही नहीं फाड़ी, बल्कि वर्दी भी फाड़ डाली। रात 2 बजे यह नजारा देखकर कई मुसाफिरों ने कह ही दिया कि लो, हो गई वर्दी की भी धुलाई।

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