सतना की राजनीति, बाबूराज, ठेकेदारी में इंजीनियरों की घुसपैठ और नेताओं की बेचैनी को लेकर सटीक कटाक्ष करती पॉवर गैलरी। संगठन में बदलाव की आहट ने नेता और अधिकारी दोनों को उलझन में डाल दिया है। पढ़िए पत्रकार धीरेन्द्र सिंह राठौर का विशेष ब्लॉग।

किसकी ड्योढ़ी पर माथा टेकें
प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के साथ ही जिला भाजपा में संगठनात्मक बदलाव की आहट भी आने लगी है। इसी आहट को भांपते हुए एक नेता जी इन दिनों खासे परेशान हैं, कि कौन सी ड्योढ़ी पर माथा टेका जाए की उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाए। कभी भाजपा जिला अध्यक्ष के प्रबल दावेदारों में से एक रहे नेता जी नई टीम में जिला महामंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं, पर जिस तरह से पिछले दिनों प्रदेश में राजनीतिक समीकरण बदले उससे नेता जी काफी परेशान हैं। बदले माहौल में शीर्ष स्तर पर शून्य बटे -सन्नाटा नेता जी कन्फ्यूज हैं, कि जिले की किस ड्योढ़ी पर अपना माथा टिकाएं जिससे उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाए दरअसल, जिला महामंत्री का जो सपना नेताजी ने पाल रखा है वह कई ड्योढ़ी की सिफारिश से पूर्ण होना है पर इनमें महत्वपूर्ण ड्योढ़ी बदली परिस्थिति में कौन सी है। यही नेता जी की सबसे बड़ी परेशानी है।
क्या मेरा भी नम्बर लगेगा
बदलाव के दौर में सभी को कुछ न कुछ उम्मीदें होती हैं। सभी को लगता है कि शायद मेरी भी लॉटरी खुल जाए, किसी की लॉटरी खुलती है, किसी को निराशा हाथ लगती है। सत्तारूढ़ दल के मुखिया के बदले जाने के बाद सतना के नेताओं की उम्मीदों को भी पंख लग गए हैं। ऐसी ही उम्मीद बस व्यवसाय से राजनीति में आए एक महानुभाव को भी है। जिला संगठन में कुछ मिलने की संभावना है नहीं और प्रदेश में पद पाने की चाहत रखने वाले नेताजी आज कल खासे बेचैन हैं। इसी बेचैनी में वे अपने कई शुभचिंतकों को फोन लगाकर सिर्फ एक ही बात पूछ रहे हैं, क्या उन्हें भी कुछ मिलेगा? प्रदेश के संगठन में मेरा भी नम्बर लगेगा? इन साहबान को प्रदेश की टीम में जगह मिले या न मिले लेकिन अपनी हरकतों की वजह से ये सत्ताधारी दल में चर्चा का विषय जरूर बने हैं।
बाबू के इशारे पर ‘साहब’
वैसे किसी भी कार्यालय में बाबूराज आम है, इससे आम जनमानस तो हमेशा परेशान रहती ही है, लेकिन जिले के सबसे बड़े कार्यालय के एक पॉवरफुल साहब अपने ही बाबू से खासे परेशान हैं, किसी भी काम को लटकाए रखने में माहिर और अपने आपको ज्ञान का भंडार मानने वाले ‘अल्पज्ञानी’ बाबू द्वारा साहब को उल्टे सीधे नियम- कायदों की दुहाई देकर भ्रमित किया जाता है, जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना की तर्ज पर साहब भी ‘अल्पज्ञानी’ बाबू से मिले ‘ज्ञान’के इशारे पर चलने को मजबूर हैं। बहुत कुछ करने की चाहत के बावजूद साहब की मजबूरी देखकर सहसा ही लोग कहने लगे हैं कि क्या बाबू ने साहब की कोई कमजोर नस पकड़ रखी है या फिर कोई और वजह है।
इंजीनियर साहब ठेकेदार हो गए
गांवों में एक प्रचलित कहावत है कि जब बाड़ ही खेत खाए तो रखवाली कौन करे? यह कहावत शहर में चल रहे निर्माण व विकास कार्योंं में सटीक बैठती है। यहां निर्माण व विकास कार्य शुरू तो हो जाते हैं, पर पूर्ण होने का नाम नहीं लेते यदि किसी तरह पूर्ण भी हो जाए तो उनकी गुणवत्ता का तो भगवान ही मालिक है। नगरीय क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्य और उनकी गुणवत्ता के साथ इन दिनों एक इंजीनियर साहब काफी चर्चा में हैं। इंजीनियर साहब पर शहर में एक तालाब के सौंदर्यीकरण के कार्य की मॉनीटरिग की जिम्मेदारी दी गई थी। इंजीनियर साहब मॉनीटरिंग करते -करते ठेकेदार बन गए और पर्दे के पीछे से निर्माण कार्यों में अपनी सहभागिता निभाने लगे। अब जब इंजीनियर साहब ही ठेकेदार और मॉनीटरिंग कर्ता बन गए तो उस काम का भगवान ही मालिक है।
विकास व कल्याण की तलाश
बीते कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी मीटर चालू, बत्ती गुल इस फिल्म में विकास और कल्याण नाम के दो पात्र थे, जो फिल्म की मुख्य भूमिका मेंं तो थे लेकिन फिल्म को दोनों किरदारों ने बांधे रखा था। यही हाल सतना शहर का है, शहरवासी भी उसी विकास और कल्याण को तलाश रहे हैं। स्मार्ट सिटी में शहर को महानगरीय सुविधाएं देने के बड़े-बड़े वायदे किए गए थे, लेकिन जनता को मिला क्या? धूल, गड्ढे, कीचड़। लोग उस विकास को तलाश रहे हैं जिसने सड़कों को तालाब, कॉलोनियों को स्वीमिंग पुल बना दिया है, हल्की बारिश में पानी नालियों में बहने की बजाए लोगों के घरों में घुस रहा है। अब जब शहरवासियों को विकास और कल्याण की सबसे ज्यादा जरूरत है। ऐसे समय पर कल्याण तो स्मार्ट सिटी में कहीं नजर आ नहीं रहा और विकास भी सीवर लाइन के चेम्बरों में छिपा बैठा है।

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पत्रकार करण उपाध्याय के कॉलम प्लेटफ़ॉर्म में सतना रेलवे विभाग के गलियारों में घूम रही दिलचस्प कहानियां – किसी अधिकारी की मलाईखोरी के किस्से, किसी की ईमानदारी की दुहाई, विकास की धीमी चाल और खुरचन की मिठास तक। प्लेटफॉर्म पर सुनाई दे रही ये चर्चाएं यात्री से लेकर अफसर तक सबको गुदगुदा रही हैं।
प्रो. रवीन्द्रनाथ तिवारी अपने लेख में कहते हैं कि भारत की 79 वर्षों की स्वाधीनता यात्रा अब वास्तविक स्वतंत्रता की ओर अग्रसर है। वे बताते हैं कि राजनीतिक आज़ादी पर्याप्त नहीं, बल्कि शिक्षा, न्याय, अर्थव्यवस्था और संस्कृति में ‘स्व’ के तंत्र की स्थापना ही असली राष्ट्रनिर्माण है। अमृतकाल का संकल्प भारत को विश्वगुरु पद पर प्रतिष्ठित करने का है।
जयराम शुक्ल अपने लेख में बताते हैं कि असली राष्ट्रप्रेम तिरंगा रैली निकालने या दिखावे से नहीं, बल्कि अपने-अपने दायित्व को ईमानदारी और निष्ठा से निभाने में है। शहीद पद्मधर सिंह से लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा तक के बलिदान का स्मरण करते हुए वे कहते हैं कि तिरंगा आचरण में दिखना चाहिए, आवरण में नहीं।
इस रिपोर्ट में जानिए कैसे सरकारी अस्पतालों में मरीजों से चंदा वसूला जा रहा है, निजी अस्पतालों को विभागीय बाबुओं का संरक्षण मिला है और स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें फैल चुकी हैं। पढ़ें ब्रजेश पाण्डेय की खास रिपोर्ट जो उठाती है स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई की परतें।
रीवा की राजनीति में एक बार फिर श्रीनिवास तिवारी की जयंती पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं। वहीं बीजेपी में आंतरिक असंतोष, कांग्रेस को बैठे-बिठाए मिला मुद्दा, और निगम-मंडल की कुर्सियों के लिए शुरू हुआ जोड़-जुगाड़, इन सबने विंध्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है। पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर मिश्रा का ब्लॉग पॉवर गैलेरी।
पत्रकार धीरेंद्र सिंह राठौर के ब्लॉग पावर गैलरी में पढ़िए — कैसे एक नेता जी दो चुनाव हारने के बाद बिजली के मीटरों की चिंगारी से फिर राजनीति में कूद पड़े हैं। साथ ही जानिए कि कैसे सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर के बाद भी अधर में लटके हैं, अफसरशाही ने जनप्रतिनिधियों को बेबस कर दिया है और सरपंच साहब ने पंचायत भवन को दुकान में बदल डाला है।
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रीवा में आयोजित पर्यटन कान्क्लेव ने विंध्य क्षेत्र में पर्यटन विकास की नई शुरुआत की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा चित्रकूट, मुकुंदपुर, संजय दुबरी जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को पर्यटन के नक्शे पर स्थापित करने की पहल न केवल क्षेत्रीय विकास, बल्कि रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण को भी गति देगी।
सतना के जिला अस्पताल में ब्लड बैंक ‘राम’ भरोसे चल रहा है। दलालों की पौ-बारह है और मरीजों की जान आफत में। अधिकारी मौन, जांच सिर्फ चाय तक सीमित। इंजीनियर से लेकर ठेकेदार तक की करतूतों पर ‘बड़े साहब’ का रौद्र रूप देखने को मिला, लेकिन कार्रवाई नदारद। पढ़िए पत्रकार बृजेश पांडे का ब्लॉग।
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