रीवा जिले की सियासत में हलचल—डिप्टी सीएम की सक्रियता से महिला जनपद अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव टला, भाजपा संगठन में स्वघोषित पदाधिकारी और हनी ट्रैप में उलझे नेता जी की चर्चा। पत्रकार रमाशंकर मिश्रा के ब्लॉग पॉवर गैलरी में पढ़िए अंदर की राजनीति।

सहारा डिप्टी सीएम का
सिरमौर महिला जनपद अध्यक्ष को लेकर अविश्वास लगभग तय था, अधिकांश सदस्य अध्यक्ष को पदच्युत करने का मन बना चुके थे। विधायक जी बचाने के लिए दर बदर भटक रहे थे...अंतत: वहीं सहारा मिला जिनका मौका मिलने पर विरोध करने से नहीं चूकते थे...अपने समर्थित अध्यक्ष का पद जाते देख विधायक ने डिप्टी सीएम से गुहार लगाई, अपनी सरल और निर्विवाद शैली के लिए जाने जाने वाले उपमुख्यमंत्री ने आनन फानन में बागी सदस्यों की बैठक लेकर सभी गिले शिकवे दूर कराते हुए संरक्षण का आश्वासन देकर मंडरा रहे अविश्वास के खतरे को बड़ी सूझबूझ से टाल दिया... अब देखना है कि आगे इस एहसान को विधायक जी किस तरह से चुकाते हैं। पहले की तरह मौका मिलने पर विरोध करेंगे या नए राजनीतिक रिश्ते की शुरूआत होगी। राजनीतिक गलियारे में विधायक जी के बदलाव की चर्चा भी जोर शोर से हो रही है। उनके समर्थक भी हतप्रभ हैं कि कल तक बड़ी-बड़ी बातें करने वाले विधायक जी अचानक शरण में कैसे पहुंच गए।
यहां दाएं बाएं वाले बहुत
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान संभालते ही हेमंत खंडेलवाल ने स्पष्ट कर दिया दाएं बाएं करने वालों पर उनकी नजर रहेगी, ऐसा करने वालों को बक्शा नहीं जाएगा... अगर ऐसा हुआ तो रीवा में दाएं बाएं करने वालों की भरमार हैं सबसे पहले प्रदेश अध्यक्ष जी को यहां निपटना होगा। पिछले अध्यक्षीय कार्यकाल में ऐसे पदाधिकारी बनाए गए जो केवल परिक्रमा में मशगूल रहे... नया अध्यक्ष बनने के बाद ऐसे लोगों ने स्पष्ट कर दिया कि वो पार्टी नहीं व्यक्ति के साथ थे, अभी नई कार्यकारिणी का गठन नहीं हुआ, जो पदाधिकारी हैं उनमें से अधिकांश ने भाजपा कार्यालय की सीढ़ी चढ़ना बंद कर दिया है, उनकी आस्था केवल एक व्यक्ति पर है...पार्टी के ही नेताओं का मानना है कि प्रदेशाध्यक्ष के लिए चुनौती पिछले कार्यकाल में तैयार किए गए खरपतवार को साफ करने की होगी... संगठनात्मक रूप से अक्षम लोगों को पदाधिकारी बनाकर संगठन को जिस तरह से पंगु किया गया उसका खामियाजा आने वाले समय में भी भुगतना पड़ सकता है... इतना तो तय है कि जिस तरह से अंधों की तरह चुन चुनकर रेवड़ी बांटी गई उससे पार्टी का भला नहीं हुआ और पहली बार महापौर सहित विधानसभा की एक सीट में हार का सामना करना पड़ा।
हनी ट्रैप के जाल में नेता जी!
सत्ता के साथ सुरा सुंदरी का मेल कोई नया नहीं है, समय समय पर इस तरह की खबरें आती रहती है। जिले में भी इस समय एक नेता जी के हनीट्रेप के जाल में फंसने की चर्चा दबी जुबान चल रही है। कहते हैं जबसे नेता जी की नस दबी वो कठपुतली की तरह इशारों में नाच रहे हैं... समर्थक इसी के चलते दूरी बना रहे... वैसे भी नेता जी अपने महिला प्रेम के चलते चर्चाओं में रहते हैं, उनकी रंगीन मिजाजी की बातें लोगों के बीच होती रहती है... कई बार ये सोशल मीडिया में भी अपनी भावनाएं व्यक्त कर चुके हैं... नेता जी अब चाहकर भी अपने मन का निर्णय नहीं ले पा रहे, पिछलग्गू बने रहना उनकी मजबूरी हो चुकी है... इन सब बातों के बाद भी उनके स्वभाव में ज्यादा अंतर नहीं देखा जा रहा, प्राथमिकता के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में महिलाओं के साथ तस्वीरें आती रहती हैं... नेता जी सुधरे या नहीं उनकी अपनी इच्छा है पर इनके नेचर से परिचित होकर सभ्य महिलाओं ने पर्याप्त दूरी बना ली।
स्वघोषित संभागीय मीडिया प्रभारी
भाजपा में एक शख्स ने खुद को संभागीय मीडिया प्रभारी घोषित कर रखा है जबकि भाजपा की तरफ से अभी तक ऐसी कोई लिस्ट नहीं निकाली, पिछले कार्यकाल में भी इन्होंने खुद को संभागीय मीडिया प्रभारी बताते हुए कुछ खबरें जारी की थी तब तत्कालीन अध्यक्ष ने सख्त हिदायत देते हुए कहा था कि अगर ऐसी गलती दुबारा की तो कार्यवाही होगी, तब से महोदय शांत बैठे थे, अब अध्यक्ष बदलते ही फिर से खुद संभागीय मीडिया प्रभारी बन बैठे जबकि पार्टी ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की न ही फिलहाल ऐसा कोई पद है, पिछले मीडिया प्रभारी को भी अभी बदला नहीं गया है। उनकी पार्टी के कार्यक्रमों से ज्यादा खुद के बयान जारी करने में दिलचस्पी रहती है जिनसे उपकृत हुए उनका नाम पार्टी गाइडलाइन से हटकर ऊपर नीचे करते रहते हैं। भाजपा कार्यकर्ता ही इनके क्रियाकलापों से आश्चर्यचकित हैं कि कैसे कोई भाजपा जैसी पार्टी में जब चाहे खुद को जो चाहे घोषित कर दे, क्या संगठन से ऊपर हैं ये...सच्चाई पार्टी के जिम्मेदार जानें पर ऐसे स्वघोषित लोग भाजपा के लिए सिरदर्द जरूर बन रहे हैं।


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पत्रकार करण उपाध्याय के कॉलम प्लेटफ़ॉर्म में सतना रेलवे विभाग के गलियारों में घूम रही दिलचस्प कहानियां – किसी अधिकारी की मलाईखोरी के किस्से, किसी की ईमानदारी की दुहाई, विकास की धीमी चाल और खुरचन की मिठास तक। प्लेटफॉर्म पर सुनाई दे रही ये चर्चाएं यात्री से लेकर अफसर तक सबको गुदगुदा रही हैं।
प्रो. रवीन्द्रनाथ तिवारी अपने लेख में कहते हैं कि भारत की 79 वर्षों की स्वाधीनता यात्रा अब वास्तविक स्वतंत्रता की ओर अग्रसर है। वे बताते हैं कि राजनीतिक आज़ादी पर्याप्त नहीं, बल्कि शिक्षा, न्याय, अर्थव्यवस्था और संस्कृति में ‘स्व’ के तंत्र की स्थापना ही असली राष्ट्रनिर्माण है। अमृतकाल का संकल्प भारत को विश्वगुरु पद पर प्रतिष्ठित करने का है।
जयराम शुक्ल अपने लेख में बताते हैं कि असली राष्ट्रप्रेम तिरंगा रैली निकालने या दिखावे से नहीं, बल्कि अपने-अपने दायित्व को ईमानदारी और निष्ठा से निभाने में है। शहीद पद्मधर सिंह से लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा तक के बलिदान का स्मरण करते हुए वे कहते हैं कि तिरंगा आचरण में दिखना चाहिए, आवरण में नहीं।
इस रिपोर्ट में जानिए कैसे सरकारी अस्पतालों में मरीजों से चंदा वसूला जा रहा है, निजी अस्पतालों को विभागीय बाबुओं का संरक्षण मिला है और स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें फैल चुकी हैं। पढ़ें ब्रजेश पाण्डेय की खास रिपोर्ट जो उठाती है स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई की परतें।
रीवा की राजनीति में एक बार फिर श्रीनिवास तिवारी की जयंती पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं। वहीं बीजेपी में आंतरिक असंतोष, कांग्रेस को बैठे-बिठाए मिला मुद्दा, और निगम-मंडल की कुर्सियों के लिए शुरू हुआ जोड़-जुगाड़, इन सबने विंध्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है। पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर मिश्रा का ब्लॉग पॉवर गैलेरी।
पत्रकार धीरेंद्र सिंह राठौर के ब्लॉग पावर गैलरी में पढ़िए — कैसे एक नेता जी दो चुनाव हारने के बाद बिजली के मीटरों की चिंगारी से फिर राजनीति में कूद पड़े हैं। साथ ही जानिए कि कैसे सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर के बाद भी अधर में लटके हैं, अफसरशाही ने जनप्रतिनिधियों को बेबस कर दिया है और सरपंच साहब ने पंचायत भवन को दुकान में बदल डाला है।
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