रीवा की राजनीति में एक बार फिर श्रीनिवास तिवारी की जयंती पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं। वहीं बीजेपी में आंतरिक असंतोष, कांग्रेस को बैठे-बिठाए मिला मुद्दा, और निगम-मंडल की कुर्सियों के लिए शुरू हुआ जोड़-जुगाड़, इन सबने विंध्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है। पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर मिश्रा का ब्लॉग पॉवर गैलेरी।

हाइलाइट्स
कांग्रेस करेगी आरती, बीजेपी भी चढ़ाएगी फूल
विंध्य की राजनीति में आज भी ‘दादा’ यानी स्व. श्रीनिवास तिवारी की गूंज वैसे ही सुनाई देती है जैसे कभी विधानसभा की दीवारों पर सुनाई देती थी। अब उनकी सौवीं जयंती आ रही है और देखिए, कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही अपनी-अपनी थाली लिए खड़े हैं। कांग्रेस ने तो हमेशा की तरह तैयारी बैठक कर ली, आखिर ‘दादा’ उनके ‘पुराने मूलधन’ हैं। लेकिन इस बार ट्विस्ट ये है कि 17 सितम्बर को त्योंथर में जो मुख्य कार्यक्रम होगा, वह भाजपा के बैनर तले होगा! यानी 'दादा' का जलवा अब दोनों दलों में 'सेयर होल्डिंग' में आ गया है। सबसे मजेदार बात दादा के पौत्र, जो अब बीजेपी विधायक हैं, वह भी दादा का जन्मदिन उसी जोश से मना रहे हैं, जैसे कांग्रेस के जमाने में मनाया जाता था। मतलब राजनीति बदल गई है, लेकिन पूजा-पाठ वही है।
वरिष्ठ विधायक भी असंतुष्ट
भारतीय जनता पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति होने के बाद जिला कार्यकारिणी का विस्तार जल्दी होगा... जिला स्तर पर इसके लिए कवायद भी तेज कर दी गई... अब कुछ वरिष्ठ विधायकों ने जिलाध्यक्ष की कार्यप्रणाली को लेकर प्रदेश संगठन से शिकायत भी की है इतना ही नहीं जिलाध्यक्ष को भी मुंह पर स्पष्ट कह दिया गया की आप मेरे क्षेत्र में विरोधियों को तरजीह दे रहे हैं व उनका नाम आगे बढ़ा रहे हैं...अगर वाकई ऐसा है तो भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं... पूर्व के जिलाध्यक्ष की ऐसी ही कारगुजारी का खामियाजा पार्टी भुगत चुकी है... फिलहाल शिकायत के बाद सुधार की गुंजाइश बनती दिख रही है।
कांग्रेस को बैठे बिठाए मिला मुद्दा
रीवा के एक थाने में गत दिनों हुए हाई बोल्टेज ड्रामे से कांग्रेस को बैठे बिठाए मुद्दा मिल गया... पहले विधानसभा में जमकर हंगामा किया गया और अब रीवा में बड़े प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है.... प्रदेश के बड़े कांग्रेसी रीवा के अपने इकलौते विधायक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिख रहे हैं.... पहले भी विधानसभा में हंगामा कर थाना प्रभारी को विधानसभा में ही निलंबित कराने वाले विधायक जी अतिउत्साह से लबरेज हैं....वो अपनी नाकामी का ठीकरा भी भाजपा के बड़े नेताओं पर आसानी से फोड़ कर सही सलामत निकल जाते हैं...वो इसी शैली के लिए जाने जाते हैं... देखना दिलचस्प होगा की इस बार उनकी रणनीति कितनी सफल होती है...फिलहाल विधायक जी प्रदेश में सुर्खियां पाकर कांग्रेस की राजनीति में अग्रणी पक्ति में शामिल होने में जरूर सफल दिख रहे।
निगम मंडल के लिए जुगाड़ शुरू
ट्रांसफर पोस्टिंग का दौर रुकने के बाद मोहन सरकार में अब निगम मंडल की नियुक्तियों का रास्ता साफ दिखने लगा है....इसके लिए दावेदारों द्वारा अपने अपने आकाओं के पास जोड़ जुगत शुरू कर दी गई है....टिकट से वंचित और चुनाव हारे हुए नेता इस आस में है कि काश उनकी लाटरी लग जाए, पर कोई खुलकर आश्वासन देने की स्थिति में नहीं दिख रहा....ऐसा माना जा रहा है कि यहां की नियुक्तियों में उप मुख्यमंत्री की पसंद को वरीयता दी जाएगी, उनके इर्द गिर्द भी दावेदारों की भीड़ दिखने लगी तो कुछ दिल्ली भोपाल में डेरा जमाए बैठे हैं....अपने अपने नेताओं के पास बायोडाटा लेकर डटे दावेदार इस बार कोई चूक नहीं करना चाहते....कारण भी है लंबे समय बाद नियुक्तियां जो हो रही हैं....समय के साथ तय होगा कि किसकी किस्मत चमकती है पर कोई कमजोरी करने के मूड में नहीं है।


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पत्रकार करण उपाध्याय के कॉलम प्लेटफ़ॉर्म में सतना रेलवे विभाग के गलियारों में घूम रही दिलचस्प कहानियां – किसी अधिकारी की मलाईखोरी के किस्से, किसी की ईमानदारी की दुहाई, विकास की धीमी चाल और खुरचन की मिठास तक। प्लेटफॉर्म पर सुनाई दे रही ये चर्चाएं यात्री से लेकर अफसर तक सबको गुदगुदा रही हैं।
प्रो. रवीन्द्रनाथ तिवारी अपने लेख में कहते हैं कि भारत की 79 वर्षों की स्वाधीनता यात्रा अब वास्तविक स्वतंत्रता की ओर अग्रसर है। वे बताते हैं कि राजनीतिक आज़ादी पर्याप्त नहीं, बल्कि शिक्षा, न्याय, अर्थव्यवस्था और संस्कृति में ‘स्व’ के तंत्र की स्थापना ही असली राष्ट्रनिर्माण है। अमृतकाल का संकल्प भारत को विश्वगुरु पद पर प्रतिष्ठित करने का है।
जयराम शुक्ल अपने लेख में बताते हैं कि असली राष्ट्रप्रेम तिरंगा रैली निकालने या दिखावे से नहीं, बल्कि अपने-अपने दायित्व को ईमानदारी और निष्ठा से निभाने में है। शहीद पद्मधर सिंह से लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा तक के बलिदान का स्मरण करते हुए वे कहते हैं कि तिरंगा आचरण में दिखना चाहिए, आवरण में नहीं।
इस रिपोर्ट में जानिए कैसे सरकारी अस्पतालों में मरीजों से चंदा वसूला जा रहा है, निजी अस्पतालों को विभागीय बाबुओं का संरक्षण मिला है और स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें फैल चुकी हैं। पढ़ें ब्रजेश पाण्डेय की खास रिपोर्ट जो उठाती है स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई की परतें।
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