इस रिपोर्ट में जानिए कैसे सरकारी अस्पतालों में मरीजों से चंदा वसूला जा रहा है, निजी अस्पतालों को विभागीय बाबुओं का संरक्षण मिला है और स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें फैल चुकी हैं। पढ़ें ब्रजेश पाण्डेय की खास रिपोर्ट जो उठाती है स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई की परतें।

हाइलाइट्स
अस्पताल में लगने लगा चंदा
पहले चंदा सिर्फ होली, दुर्गा पूजा या गणेश उत्सवों में ही मांगा जाता था, लेकिन अब समय बदल गया है। सरकारी चिकित्सक भी अब मरीजों से चंदा मांगने लगे हैं। जिले में अस्पताल के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं, और जिम्मेदार अधिकारी आँखें मूंदकर बैठे हैं। जिला अस्पताल के बड़े अधिकारी न जाने किस दबाव में हैं कि वे हर घटना से अनजान बने रहते हैं। एक चिकित्सक के लिए 'साहब' को दो बार आदेश जारी करना पड़ा। जब 'साहब' ने चिकित्सा अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया, तो चिकित्सा अधिकारी ने ऐसा चक्रव्यूह चलाया कि जिला अस्पताल के 'साहब' को क्लीन चिट देनी पड़ी और सारा आरोप पीड़ित पर लगा दिया गया। सच्चाई क्या है, यह तो जिला प्रशासन के अधिकारियों की जांच के बाद ही पता चल पाएगा।
बाबू चला रहे निजी अस्पताल
बाजार में चर्चा का दौर गर्म है कि निजी अस्पतालों को स्वास्थ्य विभाग के 'बाबू' का संरक्षण मिला हुआ है। यह बाबू किसी अधिकारी से कम नहीं है और इन्हीं के हाथ में निजी अस्पतालों की बागडोर है। विभाग के अधिकारी भी उनसे ही राय-मशवरा लेते हैं। स्वास्थ्य विभाग के धवारी स्थित कार्यालय में ये बाबू पिछले 10 सालों से जमे हुए हैं। कई अधिकारी आए और चले गए, लेकिन इनकी कुर्सी कोई नहीं हिला पाया। शहर के सभी निजी अस्पतालों की फाइलें इन्हीं के पास खुलती हैं। इनके संरक्षण में कई ऐसे निजी अस्पतालों को लाइसेंस दे दिया गया है, जिनमें कोई डॉक्टर ही नहीं है। विभागीय अधिकारी यह सब जानते हुए भी मौन हैं।
मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल के चिकित्सकों में 'जंग'
इन दिनों जिला अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था पटरी से उतर गई है। अधिकारियों ने सोचा था कि मेडिकल कॉलेज के आ जाने से चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हो जाएंगी और मेडिकल कॉलेज व जिला अस्पताल के चिकित्सक मिलकर काम करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कोई भी एक-दूसरे के साथ काम करने को तैयार नहीं है। यदि किसी मरीज को जिला अस्पताल के डॉक्टर ने देख लिया है, तो मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर उसे छूने से भी बचते हैं, मानो वह 'अछूत' बन गया हो। जिला प्रशासन ने सुबह और शाम की ओपीडी के लिए दोनों अस्पतालों के चिकित्सकों की अलग-अलग दिनवार ड्यूटी लगाने का फैसला किया। सभी ने इस पर सहमति भी जताई, लेकिन अब मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों का 'अहंकार' आड़े आ रहा है। शाम की ड्यूटी करने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। मामला बढ़ता देख जिला अस्पताल के अधिकारियों को हस्तक्षेप करना पड़ा, लेकिन बात नहीं बनी। मजबूरन अब राजधानी में बैठे अधिकारियों को चिट्ठी लिखनी पड़ी है।
लखपति बनने की दौड़ में ब्लॉक अधिकारी
स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। जिले में तो सभी अधिकारियों और बाबुओं की कुर्सियां पक्की हैं, उन्हें कोई नहीं हिला सकता। जिले की सभी मेडिकल दुकानों, अस्पतालों, नर्सिंग होम और यहाँ तक कि एंबुलेंस दलालों से भी बाबुओं की 'सेटिंग' बनी हुई है। जब जिले के अधिकारी फल-फूल रहे हैं, तो ब्लॉक अधिकारी क्यों पीछे रहें? जिले से सटे एक ब्लॉक के प्रोग्राम मैनेजर ने भी जल्दी लखपति बनने के ख्वाब में पोर्टल पर हजारों फर्जी हितग्राहियों की आईडी जेनरेट करके लाखों की सरकारी राशि का गबन कर लिया। चूँकि वह खुद ही जांच अधिकारी था, उसे लगा कि कोई उसे पकड़ नहीं पाएगा। उसने फील्ड कार्यकतार्ओं के साथ भी सांठगांठ की, लेकिन एक बैठक में मामला उजागर होते ही फील्ड कार्यकर्ता ने ब्लॉक अधिकारी को फँसा दिया। अब विभाग के बड़े 'साहब' को जांच का जिम्मा सौंपा गया है। बड़े साहब ने कारण बताओ नोटिस तो जारी किया, लेकिन उसे अपने तक ही सीमित रखा। अब वक्त ही बताएगा कि लखपति कौन बनता है, ब्लॉक अधिकारी या स्वास्थ्य विभाग के बड़े साहब।


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पत्रकार करण उपाध्याय के कॉलम प्लेटफ़ॉर्म में सतना रेलवे विभाग के गलियारों में घूम रही दिलचस्प कहानियां – किसी अधिकारी की मलाईखोरी के किस्से, किसी की ईमानदारी की दुहाई, विकास की धीमी चाल और खुरचन की मिठास तक। प्लेटफॉर्म पर सुनाई दे रही ये चर्चाएं यात्री से लेकर अफसर तक सबको गुदगुदा रही हैं।
प्रो. रवीन्द्रनाथ तिवारी अपने लेख में कहते हैं कि भारत की 79 वर्षों की स्वाधीनता यात्रा अब वास्तविक स्वतंत्रता की ओर अग्रसर है। वे बताते हैं कि राजनीतिक आज़ादी पर्याप्त नहीं, बल्कि शिक्षा, न्याय, अर्थव्यवस्था और संस्कृति में ‘स्व’ के तंत्र की स्थापना ही असली राष्ट्रनिर्माण है। अमृतकाल का संकल्प भारत को विश्वगुरु पद पर प्रतिष्ठित करने का है।
जयराम शुक्ल अपने लेख में बताते हैं कि असली राष्ट्रप्रेम तिरंगा रैली निकालने या दिखावे से नहीं, बल्कि अपने-अपने दायित्व को ईमानदारी और निष्ठा से निभाने में है। शहीद पद्मधर सिंह से लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा तक के बलिदान का स्मरण करते हुए वे कहते हैं कि तिरंगा आचरण में दिखना चाहिए, आवरण में नहीं।
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रीवा की राजनीति में एक बार फिर श्रीनिवास तिवारी की जयंती पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं। वहीं बीजेपी में आंतरिक असंतोष, कांग्रेस को बैठे-बिठाए मिला मुद्दा, और निगम-मंडल की कुर्सियों के लिए शुरू हुआ जोड़-जुगाड़, इन सबने विंध्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है। पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर मिश्रा का ब्लॉग पॉवर गैलेरी।
पत्रकार धीरेंद्र सिंह राठौर के ब्लॉग पावर गैलरी में पढ़िए — कैसे एक नेता जी दो चुनाव हारने के बाद बिजली के मीटरों की चिंगारी से फिर राजनीति में कूद पड़े हैं। साथ ही जानिए कि कैसे सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर के बाद भी अधर में लटके हैं, अफसरशाही ने जनप्रतिनिधियों को बेबस कर दिया है और सरपंच साहब ने पंचायत भवन को दुकान में बदल डाला है।
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