पत्रकार करण उपाध्याय के कॉलम प्लेटफ़ॉर्म में सतना रेलवे विभाग के गलियारों में घूम रही दिलचस्प कहानियां – किसी अधिकारी की मलाईखोरी के किस्से, किसी की ईमानदारी की दुहाई, विकास की धीमी चाल और खुरचन की मिठास तक। प्लेटफॉर्म पर सुनाई दे रही ये चर्चाएं यात्री से लेकर अफसर तक सबको गुदगुदा रही हैं।

हिस्से का किस्सा
रेलवे विभाग में एक किस्सा खूब चल रहा है। एक साहब की कुर्सी तो बड़ी हो गई लेकिन पुरानी आदत अभी छूटी नहीं है। साहब ने कुछ ठेकेदारों को काम बांट रखे थे। अभी ठेकेदारों से उनके हिस्से का इनाम नहीं मिला है, इससे साहब परेशान हैं। ऐसा इस लिए क्योंकि उनका तबादला कहीं दूसरी जगह न हो जाए। तबादले से पहले वे चाहते हैं कि ठेकेदार उनकी जेब गर्म कर दें। ठेकेदार भी चतुर चालाक हैं। उन्हें लगता है कि अब तो साहब जल्दी जाने वाले हैं फिर उनका हिस्सा क्यों दिया जाए। अब सच्चाई क्या है यह तो भगवान ही जाने,लेकिन यह किस्सा इन दिनों रेलवे के गलियारों में चटकारे लेकर सुनाया जा रहा है।
ईमानदारी का पीट रहे ढिंढोरा
मेन कुर्सी पर बैठे एक अधिकारी ईमानदारी का ढिंढोरा पीटते थकते नहीं हैं। इसके पहले भी जो थे वो भी इसी रास्ते पर थे। वर्तमान समय में बैठे अधिकारी पहले वाले को यह कहते नहीं थकते कि उनके पहले जो थे उन्होंने बड़ी मलाई खाई है। ड्यूटी में खाली छोला लाते थे और झोला भर कर ले जाते थे। क हते है कि वे खाने के बड़े शौकीन थे। दराज में चना-मूंगफली पैके ट भरे पड़े रहते थे। एक्सपाइरी डेट के पैकेट भी नहीं बचते थे। मेन कुर्सी में अब बैठे अधिकारी जब देखों तब जेब ही दिखाते रहते हैं। हमारे पास तो सौ-दो सौ रुपइया बस रहत हैं, 20 की चाय मगवां लई। एक ने कहा कि अब सच्चाई क्या है यह तो भगवान ही जाने हर पहले वाले व्यक्ति को सब यही कहते हैं कि उसने बड़ी मलाई खाई है।
डबल इंजन भी नहीं खीच पा रहा ‘विकास’ की रेल
स्टेशन का पुनर्विकास और विस्तार कर सतना को प्रगति की रफ्तार देने की बड़ी-बड़ी बातें हुर्इं। स्टेशन पुनर्विकास का मॉडल प्लेटफार्म में सजा तो रखा हैं लेकिन काम की गति न दिखने से यात्री कहते हंै कि गति शक्ति की गति इतनी सुस्त हो गई है कि रेलवे का ‘विकास’ उम्मीदों के अनुसार नहीं दौड़ पा रहा है। 2 साल बीतने को है और अभी तक स्ट्रक्चर डिजाइन का अता-पता नहीं है। कहते है कि सतना-पन्ना नई रेल लाइन हो या फिर सतना-रीवा डबल रेल लाइन परियोजनाओं की चाल सुस्त है। ये हाल तब है जब डबल इंजन की सरकार है। कैमा का विकास एक दशक से चल रहा है। अंगे्रजों के जमाने का मालगोदाम की वजह से बाजार रोड में लगने वाला जाम शहरवासियों व यात्रियों के लिए अब नासूर बन गया है। उधर माननीय मंच से विकास की गाथा सुनाते थकते नहीं हैं, इधर सतना जंक्शन से या तो विकास रूठ गया है या फिर उसकी चाल इतनी धीमी है कि वह स्थिर खड़ा नजर आ रहा है।
खुरचन घोल रहा मिठास
सतना स्टेशन में लगे खुरचन का स्वाद यात्री ले या ना लें, लेकिन यहां का खुरचन अब उत्तर रेलवे के लखनऊ डिवीजन तक के अधिकारी ले रहे हैं। यात्रियों के साथ रेल अधिकारियों के संबंध में मिठास लाने का जरिया भी बना हुआ है। रक्षाबंधन का त्यौहार था एक रेलवे अधिकारी ने खुरचन स्टॉल संचालक से खुरचन लखनऊ भेजने की बात कहीं। स्टॉल संचालक ने कहा साहब पिछली बार से बेहतर दूंगा। अधिकारी ने कहा लखनऊ के साहब हमारे खास हंै। लखनऊ ही नहीं बल्कि जबलपुर भी खूब खुरचन इस बार राखी के पर्व में भेजा गया है। अधिकारियों के साथ-साथ कई रेलवे के ठेकेदारों ने भी इंजीनरिंग व निर्माण सेक्शन के अधिकारियों को खुरचन भेजा,ताकि खुरचन की मिठास उनके ठेके के कामों में भी घुल सके। मंडल अधिकारी भी खुरचन का दोहरा गिफ्ट पाकर गद-गद हैं।

पत्रकार करण उपाध्याय के कॉलम प्लेटफ़ॉर्म में सतना रेलवे विभाग के गलियारों में घूम रही दिलचस्प कहानियां – किसी अधिकारी की मलाईखोरी के किस्से, किसी की ईमानदारी की दुहाई, विकास की धीमी चाल और खुरचन की मिठास तक। प्लेटफॉर्म पर सुनाई दे रही ये चर्चाएं यात्री से लेकर अफसर तक सबको गुदगुदा रही हैं।
प्रो. रवीन्द्रनाथ तिवारी अपने लेख में कहते हैं कि भारत की 79 वर्षों की स्वाधीनता यात्रा अब वास्तविक स्वतंत्रता की ओर अग्रसर है। वे बताते हैं कि राजनीतिक आज़ादी पर्याप्त नहीं, बल्कि शिक्षा, न्याय, अर्थव्यवस्था और संस्कृति में ‘स्व’ के तंत्र की स्थापना ही असली राष्ट्रनिर्माण है। अमृतकाल का संकल्प भारत को विश्वगुरु पद पर प्रतिष्ठित करने का है।
जयराम शुक्ल अपने लेख में बताते हैं कि असली राष्ट्रप्रेम तिरंगा रैली निकालने या दिखावे से नहीं, बल्कि अपने-अपने दायित्व को ईमानदारी और निष्ठा से निभाने में है। शहीद पद्मधर सिंह से लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा तक के बलिदान का स्मरण करते हुए वे कहते हैं कि तिरंगा आचरण में दिखना चाहिए, आवरण में नहीं।
इस रिपोर्ट में जानिए कैसे सरकारी अस्पतालों में मरीजों से चंदा वसूला जा रहा है, निजी अस्पतालों को विभागीय बाबुओं का संरक्षण मिला है और स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें फैल चुकी हैं। पढ़ें ब्रजेश पाण्डेय की खास रिपोर्ट जो उठाती है स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई की परतें।
रीवा की राजनीति में एक बार फिर श्रीनिवास तिवारी की जयंती पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं। वहीं बीजेपी में आंतरिक असंतोष, कांग्रेस को बैठे-बिठाए मिला मुद्दा, और निगम-मंडल की कुर्सियों के लिए शुरू हुआ जोड़-जुगाड़, इन सबने विंध्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है। पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर मिश्रा का ब्लॉग पॉवर गैलेरी।
पत्रकार धीरेंद्र सिंह राठौर के ब्लॉग पावर गैलरी में पढ़िए — कैसे एक नेता जी दो चुनाव हारने के बाद बिजली के मीटरों की चिंगारी से फिर राजनीति में कूद पड़े हैं। साथ ही जानिए कि कैसे सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर के बाद भी अधर में लटके हैं, अफसरशाही ने जनप्रतिनिधियों को बेबस कर दिया है और सरपंच साहब ने पंचायत भवन को दुकान में बदल डाला है।
सतना संभाग में बिजली विभाग की ‘कुर्सी’ को लेकर मची होड़, नए अफसर के आने से विभाग में लगा ‘करंट’। स्मार्ट मीटर से लेकर वसूली तक की नई योजनाएं, और गर्मी में सोए अधिकारी अब बारिश में ‘चार्ज’ होकर आम जनता पर टूटे। पढ़ें बृजेश पाण्डेय की तीखी और चुटीली रिपोर्ट।
रीवा में आयोजित पर्यटन कान्क्लेव ने विंध्य क्षेत्र में पर्यटन विकास की नई शुरुआत की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा चित्रकूट, मुकुंदपुर, संजय दुबरी जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को पर्यटन के नक्शे पर स्थापित करने की पहल न केवल क्षेत्रीय विकास, बल्कि रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण को भी गति देगी।
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पुलिस विभाग की अंदरूनी राजनीति, संबंधों का असंतुलन, पसंद-नापसंद से उपजी तकरार, और अफसरों की संवादहीनता की हकीकत को बारीकी से उजागर करता अमित सेंगर का व्यंग्यात्मक विश्लेषण। थानों से लेकर अफसरों की केबिन तक फैली चुप्पियों और शिकायतों का दिलचस्प दस्तावेज़।

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