सतना के जिला अस्पताल में ब्लड बैंक ‘राम’ भरोसे चल रहा है। दलालों की पौ-बारह है और मरीजों की जान आफत में। अधिकारी मौन, जांच सिर्फ चाय तक सीमित। इंजीनियर से लेकर ठेकेदार तक की करतूतों पर ‘बड़े साहब’ का रौद्र रूप देखने को मिला, लेकिन कार्रवाई नदारद। पढ़िए पत्रकार बृजेश पांडे का ब्लॉग।

हाइलाइट्स
‘राम’ भरोसे ब्लड बैंक
प्रधानमंत्री जी के 'आपदा को अवसर में बदलने' वाले नारे को ब्लड बैंक के दलालों ने सच कर दिखाया। अस्पताल में रोगियों की 'आपदा' खून के दलालों के लिए 'अवसर' बन रही है। आए दिन कोई न कोई गरीब इनके चंगुल में फंस जाता है और बिक जाता है। ये कोई आज का नया मुद्दा नहीं है, ये तो कई वर्षों से चला आ रहा है, और चले भी क्यों न? क्योंकि यहां का संचालन 'राम' भरोसे जो हो रहा है। सालों से जमे 'प्रभारी' को हटाने वाला कोई नहीं है। 'प्रभारी' जी का तबादला भी हुआ और दो दिन में कैंसल भी हो गया। बड़ी 'ताकत' है इनके पास, इनका कोई 'बाल भी बांका' नहीं कर सकता।
याद आई 'नानी'
ताव में आए 'जिले' के 'बड़े साहब' ने भी छुट्टी के दिन अस्पताल की बैठक ले ली। अस्पताल के 'बड़े बाबू' संग अधिकारी भी पहुंच गए। सोचा कि जिले के 'बड़े साहब' चाय-नाश्ता करेंगे और चले जाएंगे, लेकिन उन्हें क्या पता साहब आज फुल होमवर्क करके आए हैं। बैठक में पहुंचते ही बड़े साहब ने सवाल दाग दिए कि अस्पताल के अधिकारी बगलें झांकने लगे। उन्हें जवाब देने के लिए फोन करके दूसरे से फाइल तक मंगानी पड़ी। ये सब देख 'बड़े साहब' ने जिला अस्पताल के 'अधिकारी' के ऊपर पूरा गुस्सा उतार दिया। बैठक खत्म होते ही सबने सोचा चलो अब घर जाकर खुश होकर खाना खाएंगे और आराम करेंगे, लेकिन साहब ने उस पर भी 'पानी फेर' दिया।
'जांच अधिकारी' को मिली 'चाय'
खून दलाली का मुद्दा ऐसा छाया कि रात में ही 'जिले' के 'बड़े साहब' ने 'स्वास्थ्य विभाग' के साहब को फोन मिला दिया और जांच करने को कहा। 'स्वास्थ्य विभाग' के साहब को रात भर नींद नहीं आई। सुबह से ही गाड़ी सजने लगी। अस्पताल में ढिंढोरा पिट गया कि साहब आने वाले हैं। फिर क्या था सब कुछ अस्पताल में चाक चौबंद होने लगा। कामगार अपने काम में लग गए, सबने ड्रेस पहन ली, नए स्ट्रेचर और व्हीलचेयर निकल आए। आज मरीजों को 'वार्ड बॉय' भी मिल गया। साहब जांच करने पहुंचे तो तुरंत साहब को कम शक्कर वाली 'चाय' परोसी गई और साहब ने कह दिया 'ओके'। बस फिर क्या, सारा ठीकरा 'आशा' के सिर फोड़ दिया गया और एक बार फिर 'दलाल' को अभयदान मिल गया।
इंजीनियर के उतारे भूत
बड़े साहब मीटिंग से निकलते ही नए अस्पताल के निरीक्षण में निकले ही थे कि आगे-आगे 'इंजीनियर' भागने लगे और रास्ते से गाड़ियों को हटाने लगे। ऐसा लगा कि कोई बड़ी विपदा आ गई हो। साहब प्वॉइंट पर पहुंच गए और इंजीनियर से पूछ ही लिया कि क्या दिक्कत है? कब तक इसे पूरा करोगे? बेचारा इंजीनियर असमंजस में पड़ अधिकारियों के चेहरे निहारने लगा कि क्या बोल दूं? सही बोलता हूं तो 'अधिकारी और बाबू' मारेंगे, अगर गलत बोलता हूं तो 'बड़े साहब' मारेंगे। इंजीनियर के गले में 'पानी' ही सूख गया, उसने जवाब दिया कि "दो माह"। चलो बड़े साहब का गुस्सा शांत हुआ।
'बड़े साहब' से बहस जिंदगी तहस-नहस
इंजीनियरों ने अपने बचाव में पार्किंग ठेकेदार को आगे कर दिया और वह बड़े साहब की बलि चढ़ गया। साहब ने तीखे अंदाज में उसका ठेका बंद करने को कह दिया, लेकिन फायदा उठाने वाले बाबुओं ने ठेकेदार की थोड़ी तरफदारी कर कहा कि 'बड़े साहब' ऐसे में बड़ी दिक्कतें आ जाएंगी। अस्पताल में मनमानी गाड़ियां खड़ी होने से समस्याएं बढ़ जाएंगी। 'बाबुओं' के ये कहने पर ठेकेदार खुश हुआ ही था कि इंजीनियरों ने फिर 'बड़े साहब' से चुगली कर दी। अब तो बड़े साहब का अंदाज ही बदल गया। बड़े साहब ने रौद्र रूप दिखाते हुए कहा कि "तुझे 'जेल भेज दूंगा'".... और ठेकेदार की गर्मी उतर गई और इंजीनियरों को अभयदान मिल गया।


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